Sunday, June 4, 2017

दूर्वा !!

प्रायः जो वस्तु स्वास्थ्य के लिए हितकर सिद्ध होती थी, उसे हमारे पूर्वजों ने धर्म के साथ जोड़कर उसका महत्व और भी बढ़ा दिया। दूब भी ऐसी ही वस्तु है। यह सारे देश में बहुतायत के साथ हर मौसम में उपलब्ध रहती है। दूब का पौधा एक बार जहाँ जम जाता है, वहाँ से इसे नष्ट करना बड़ा मुश्किल होता है। इसकी जड़ें बहुत ही गहरी पनपती हैं। दूब की जड़ों में हवा तथा भूमि से नमी खींचने की क्षमता बहुत अधिक होती है, यही कारण है कि चाहे जितनी सर्दी पड़ती रहे या जेठ की तपती दुपहरी हो, इन सबका दूब पर असर नहीं होता और यह अक्षुण्ण बनी रहती है।
( तंत्र शास्त्र में उल्लेख )
पाँच दुर्वा के साथ भक्त अपने पंचभूत-पंचप्राण अस्तित्व को गुणातीत गणेश को अर्पित करते हैं। इस प्रकार तृण के माध्यम से मानव अपनी चेतना को परमतत्व में विलीन कर देता है। गणेश की पूजा में दो, तीन या पाँच दुर्वा अर्पण करने का विधान तंत्र शास्त्र में मिलता है। इसके गूढ़ अर्थ हैं। संख्याशास्त्र के अनुसार दुर्वा का अर्थ जीव होता है, जो सुख और दु:ख ये दो भोग भोगता है। जिस प्रकार जीव पाप-पुण्य के अनुरूप जन्म लेता है। उसी प्रकार दुर्वा अपने कई जड़ों से जन्म लेती है। दो दुर्वा के माध्यम से मनुष्य सुख-दु:ख के द्वंद्व को परमात्मा को समर्पित करता है। तीन दुर्वा का प्रयोग यज्ञ में होता है। ये 'आणव', 'कार्मण और 'मायिक'रूपी अवगुणों का भस्म करने का प्रतीक है।
( उद्यानों की शोभा )
दूब को संस्कृत में 'दूर्वा', 'अमृता', 'अनंता', 'गौरी', 'महौषधि', 'शतपर्वा', 'भार्गवी' इत्यादि नामों से जानते हैं। दूब घास पर उषा काल में जमी हुई ओस की बूँदें मोतियों-सी चमकती प्रतीत होती हैं। ब्रह्म मुहूर्त में हरी-हरी ओस से परिपूर्ण दूब पर भ्रमण करने का अपना निराला ही आनंद होता है। पशुओं के लिए ही नहीं अपितु मनुष्यों के लिए भी पूर्ण पौष्टिक आहार है दूब। महाराणा प्रताप ने वनों में भटकते हुए जिस घास की रोटियाँ खाई थीं, वह भी दूब से ही निर्मित थी।[3] राणा के एक प्रसंग को कविवर कन्हैया लाल सेठिया ने अपनी कविता में इस प्रकार निबद्ध किया है-
अरे घास री रोटी ही,
जद बन विला वड़ो ले भाग्यो।
नान्हों सो अमरयौ चीख पड्यो,
राणा रो सोयो दुख जाग्यो।
( औषधीय गुण )
दूब घास की शाखा
अर्वाचीन विश्लेषकों ने भी परीक्षणों के उपरांत यह सिद्ध किया है कि दूब में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं। दूब के पौधे की जड़ें, तना, पत्तियाँ इन सभी का चिकित्सा क्षेत्र में भी अपना विशिष्ट महत्व है। आयुर्वेद में दूब में उपस्थित अनेक औषधीय गुणों के कारण दूब को 'महौषधि' में कहा गया है। आयुर्वेदाचार्यों के अनुसार दूब का स्वाद कसैला-मीठा होता है। विभिन्न पैत्तिक एवं कफज विकारों के शमन में दूब का निरापद प्रयोग किया जाता है। दूब के कुछ औषधीय गुण निम्नलिखित हैं-
संथाल जाति के लोग दूब को पीसकर फटी हुई बिवाइयों पर इसका लेप करके लाभ प्राप्त करते हैं।
इस पर सुबह के समय नंगे पैर चलने से नेत्र ज्योति बढती है और अनेक विकार शांत हो जाते है।
दूब घास शीतल और पित्त को शांत करने वाली है।
दूब घास के रस को हरा रक्त कहा जाता है, इसे पीने से एनीमिया ठीक हो जाता है।
नकसीर में इसका रस नाक में डालने से लाभ होता है।
इस घास के काढ़े से कुल्ला करने से मुँह के छाले मिट जाते है।
दूब का रस पीने से पित्त जन्य वमन ठीक हो जाता है।
इस घास से प्राप्त रस दस्त में लाभकारी है।
यह रक्त स्त्राव, गर्भपात को रोकती है और गर्भाशय और गर्भ को शक्ति प्रदान करती है।
कुँए वाली दूब पीसकर मिश्री के साथ लेने से पथरी में लाभ होता है।
दूब को पीस कर दही में मिलाकर लेने से बवासीर में लाभ होता है।
इसके रस को तेल में पका कर लगाने से दाद, खुजली मिट जाती है।
दूब के रस में अतीस के चूर्ण को मिलाकर दिन में दो-तीन बार चटाने से मलेरिया में लाभ होता है।
इसके रस में बारीक पिसा नाग केशर और छोटी इलायची मिलाकर सूर्योदय के पहले छोटे बच्चों को नस्य दिलाने से वे तंदुरुस्त होते है। बैठा हुआ तालू ऊपर चढ़ जाता है।

Friday, May 19, 2017

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।।                            - (सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।).
बड़ी ही मंगलकामना है !जिसने भी ये प्रार्थना की होगी वो बड़ा ही सुखी व्यक्ति रहा होगा ! 
ध्यान  रहे मंगल कामनाएं  हमेशा  तृप्त  हृदय से ही  निकलती हैं ! दग्ध हृदयों से अहा अथवा तो प्यास निकलती है ! जिसके पास जो होगा वही दे सकेगा ! जिन्हें संसार  के पदार्थों की  कामना शेष रहती है वो गरीबों के झोपड़ों में जाते हैं लाव लश्कर के साथ ! और थोड़े अन्न -धन आदि के साथ अपनी अतृप्त कामनाएं भी अन्यों में फैला देते हैं ! फिर वही कामनाएं आपके दिए अन्न से पोषित होकर फलती फूलती हैं और और पाने की लालसा लिए इस हृदय से उस हृदय की यात्रा करती हैं ! ये अतृप्त कामनाएं जहाँ -जहाँ जाती हैं वहां वहां अपनी तरंगें प्रवाहित करती हुई नई नई कामनाओं का जाल बुनती हैं और परिणाम में दुःख छोड़ जाती हैं ! फिर कोई दूसरा दग्ध हृदय आशीर्वाद की कामना लिए उस #दुःखसागर के तट पर आ पहुंचता है ! ये प्रक्रिया अनवरत चल रही है ! सब दुखी हैं ,सब सुख ढूंढ रहे हैं ! और परिणाम में दुःख पा रहे हैं ! हर ओर अफरा -तफरी का माहौल है ! 
जहाँ एक व्यक्ति गया उसी के पीछे भीड़ इकट्ठी होकर दौड़ पड़ी है ! इसे मिला तो मुझे भी अवश्य ही मिलेगा ! 
ये संसार दुःख का बगीचा है ! जिसमें कामनाओं के बीज बोये जाते हैं तृष्णा से सींचे जाते हैं अतृप्ति की खाद  डाल-डाल कर भिन्न -भिन्न आकार, रूप -रंग के दुःख फूलों की शक्ल में खिल रहे हैं ! 
यही चक्र निरंतर चल रहा है ! !!
इसलिए रुकने से पहले ,मांगने से पहले यहाँ तक कि झोली उठाने से पहले विचार करो ! सोचो हम क्या चाहते है!यदि सुख की तलाश है तो कोई सुखी व्यक्ति ढूंडो ! 
सुखी व्यक्ति मानसरोवर सा होता है ! जितने डूबोगे उतने ही तृप्त होते जाओगे ! क्योंकि वो अपने आप में परिपूर्ण है ! वहां तुम्हारी अतृप्ति के लिए कोई ठौर नहीं ! आप अतृप्ति दो वो मिलते ही तृप्ति में बदल जाएगी ! आप अग्नि ले जाओ वो राख हो जाएगी ! आप अंजुरी भर पी लो ! आँख से ,कान से .आपके दग्ध हृदय की ज्वाला सुख में बदल जाएगी ! फिर आपभी उस मानसरोवर का ही एक भाग होंगे ! फिर वही काम आप भी कर सकेंगे जो उसने किया ! और इस तरह  कड़ी से कड़ी जुड़ती चली जाये तो फिर इस बगीचे के फूलों का स्वभाव बदलने लगेगा !

सर्वे भवन्तु सुखिनः !!

Friday, May 12, 2017

 एक ज्वलंत प्रश्न --
"अपेक्षाएँ दुख का कारण होती हैं"
सही बात है परंतु सवाल ये है कि क्या अपेक्षा करने के इस स्वभाव को त्याग सकते हैं अगर सामाजिक ताने बाने में रहना है?
जाग्रत उत्तर -
Vijay Nanda यदि राजा जनक जैसा आचार विचार हो तभी यह संभव है वरना मोहमाया के विराट जंजाल से निकल पाना नामुमकिन है आप भिखारी को भीख देते समय भी एक आस रखते है दिल के किसी कोने में कि इसकी दुआ मिलेगी
वर्तमान दौर में देखे तो साधु संत भी किसी ना किसी आस में प्रवचन दे
रहे है
तो बहनजी यह सोचना कि समाज में रहकर वगैर आस के कोई भी इंसान कोई भी कर्म का निर्वहन कर रहा है एक भयानक भूल होगी
यह मेरा निजी विचार है
माता पिता का वंश विस्तार चाहना क्या है एक आस ही तो है कि मेरा वंश आगे बढ़ेगा राजा दशरथ भी इससे अछूते नही रहे
आस किसी भी प्रकार की हो सकती है मान मर्यादा की भूख , तारीफ की भूख , नाम की भूख , वासना की भूख , प्रेम की भूख ,अर्थाथ इंसान किसी ना किसी रूप में आस के समुंदर में समाया हुआ है

 Ajit Pathak-------
आशा हि परमं दु:खम ; नैराशयं परमं सु:खम ।। सभी दुखों का मूल कारण आशा यानि अपेक्षा ही है , ईस जगत के प्रति हमें नैराश्य ही रहना चाहिये । सुख का मूल कारण यही है अपेक्षा रहित । 
 
! लेकिन प्रश्न ये है कि क्या अपेक्षाओं को त्याग कर सह अस्तित्व के सिद्धांत का पालन हो सकता है . 
 
Ajit Pathak अस्ततित्व कैसा और किसका ,,, ईस शरीर का : जो नश्वर एवं मिथ्या है । और सत्य स्वरुप आत्मा तो स्वयं में सर्व अस्तित्व संपन्न है फिर उसे क्या जरुरत । । और जीव त्रिगुणात्मिका माया से वशीभूत हो , हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश से कभी दुखी तो कभी सुखी हो जाता है  
ये सब माया के अंतर्गत होने के नाते असत्यवत ही है । विशुद्ध रुप परमात्मा भगवान श्री कृष्ण के चरण कमल आश्रित जीव ईन सभी मायिक बंधनों से स्वत: मुक्त हो जाता है । और शरणागति होने के कारण सारे मूलभुत सिद्धांत एवं सारे भगवद गुण आ जाने के कारण वो सभी अवस्थाओं से परे हो जाता है । पर ,,,,,, सोई जानहिं जेहि देहु जनाई । जानत तुम्हहिं तुम्हहि होई जाई ।। श्री राधे ।।

बहुत ही अच्छा विवेचन ! लेकिन ये स्थूल दुनिया शरीरों से बनी है और सहस्तित्व का प्रश्न शरीरों के लिए ही रखा गया है !  
 -Anil Pradhan पहले हमें कृपया यह तय करना है कि हमें सत्य की ओर चलना है या क्षमा करिएगा दुनियां में रहना है या रहते हुए अपने मार्ग की ओर कदम बढ़ाने है।।
 Anil Pradhan होइहि सोइ जो राम रचि राखा
को करे तरक बढ़ावे साखा

स्वयं को शरीर मानने में ही उलझना है। अपेक्षाओं को त्याग कर भी सह-अस्तित्व के सिद्धांत का पालन हो सकता है।।
उसके लिए स्वयं को जीवन्मुक्त आत्मा मानकर एक दृष्टा की भाँति व्यव्हारित होना पड़ेगा।।
जिस हेतु स्थितप्रज्ञ की अवस्था में रहना आवश्यक है।।

स्वयं दृश्य बनने पर अटकना है।।

जो जैसा है उसे वैसा ही मानना लेकिन दृश्य में आसक्त न होना।
उमा कहहुँ मैं अनुभव अपना
सत हरि भजन जगत सब सपना

चरैवेति चरैवेति प्रचलामि निरन्तर ||
Ajit Pathak अपेक्षा निभाना ही परेगा यही तो माया है जिस दिन ये द्ंव्द खत्म हो जायेगी कि वास्तविक में सर्वरुप श्री हरि ही हैं तो हमारा कर्म स्वत: निष्काम हो जायेगा अथवा समस्त कर्म परमात्मा श्री कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए होगा । अर्थात माता पिता पुत्र पुत्री स्वजन सभी के रुप मे श्री हरि हि विद्यमान है उनकी सेवा भी श्री हरि सेवा है , ऐसा समझकर हम यहां रहते हुए भी अपेक्षारहित जीवन जी सकते हैं और कर्मफल के बंधनों से भी मुक्त हो सकते हैं । जय जय श्री राधे
स्थूल जगत और सुक्ष्म जगत में थोङा थोङा भेद है ं। सूक्ष्म शरीर और जगत भी मायायुक्त ही है । माया युक्त जीव ईसी स्थूल जगत और शरीर के लिए अपेक्षाए रखता है और कर्म करता है । और जो थोङा बहुत ज्ञानी है वो स्थूल को मायिक मानते हुए परलोक और सूक्ष्म जगत के लिए आपेक्षित हो कर्म करता है और वो भी नित्य आनंद न पाकर कर्मफल भोग दुखी ही हो जाता है और पतन करवा लेता है । यहां तो ईन सबसे परे श्री कृष्ण भक्ति ही करनी चाहिये । न कोई आशा न कोई अपेक्षा मान अपमान से परे सब में श्री हरि को देखते हुए वात विवाद से बचते हुए , श्री हरि की चिंतन करनी चाहिये । फिर ईस शरीर के लिए प्रश्न हि क्या बचेगा । जो हो हरि कृपा ।। जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिये ।

! आपकी बात अक्षरशः सत्य है ! लेकिन दुनियां का सिद्धांत इसमें बाधक है ! वो कहती है आप मुझसे अपेक्षा न रखें ये आप की बात !! लेकिन जब तक आप यहाँ हैं आपको हमारी अपेक्षाओं से निभाना ही पड़ेगा !
 
    शरीर के लिए प्रश्न कैसा ?? जो नाशवान है , क्षणिक है , विद्वान उस चक्कर में नहीं परते । जो नित्य है सत्य है शास्वत है मुक्त है परमात्मा का अंश है वो परमात्मा तक कैसे पहुंचे ,, अति सुगम क्या मार्ग हो वहां तक पहुंचने के लिए हमें ईन प्रश्नों का हल ढुंढना चाहिये । मुझ अल्पमति को तो श्री हरि ने यही सुझाया है । जय जय श्री राधे ।
 
Ajit Pathak या सभी संसारी जनों को मायावत मान सभी से परे होकर एककांत श्री कृष्ण चिंतन ही करना चाहिये । वही मायापति हैं उन्ही की ईच्छा से माया भागेगी अन्यथा स्वत: कुछ नहीं होगा । दैवीह्रोषागुणमयी मम माया दुरत्यया । मामैव ये प्रपद्यंते मायार्मेतां तरंतिते ।। गीता ।।   
                     
आज कितने दिनों में आपकी दिव्य वाणी का रसास्वादन मिला !जय हो ! 🙏🙏                                                    
 अब आप ही कहें ! इस सुंदर सत्संग की अपेक्षा कोई छोड़ सकता है ! हमें आपसे यही अपेक्षा थी ! धन्य घडी सोई जब सतसंगा ..
सतसंगति के समान तो और कुछ भी नहीं । संतसंगति अति दुर्लभं । मुक्ति पाना आसान हो सकता है पर सत्संग का एक क्षण मिलना भी अति दुर्लभ ।
विन सत्संग विवेक न होई । राम कृपा विन सुलभ न सोई ।।
विषय को त्याग केवल श्री हरि चर्चा ही कलि में श्रेष्टतम है । उमा कहहुं वे लोग अभागी । हरिपद छोङ विषय अनुरागी ।। श्री राधे ।।
Anil Pradhan मुखों पवित्रं यदि राम नामं
हृदयो पवित्रं यदि ब्रह्म ज्ञानं
चरणौ पवित्रं यदि तीर्थ गमनं

हस्तौ पवित्रं यदि पुण्य दानं

धन्य घड़ी सोइ जब सत्संगा
धन्य जनम द्विज भगति अभंगा

अब मोहि भा भरोस हनुमंता....
बिनु हरि कृपा मिलहिं नहिं संता....
विषय को त्याग केवल

श्री हरि
चर्चा ही कलि में श्रेष्टतम है ।
उमा कहहुं वे लोग अभागी ।
हरिपद छोङ विषय अनुरागी ।। श्री राधे ।।

     Ajit Pathak जय हो जय हो । मुख से कर गुणगान ,, ह्रदय में रख श्री कृष्ण रति । चरण से धाम हस्त से दान ,, कब समझेगा मंदमति ।। श्री हरि से यही प्रार्थना हैं 
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इति वार्ता :
जय जय श्री राधे गोविन्द .

 

Monday, May 8, 2017

!!ॐ शांति !!
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बड़ी पुरानी बात है एक गृहस्थ सन्यासी के पास एक युवक पहुंचा ! गृहस्थ इसलिए कि वो घर छोडकर जंगल में न गये थे ! तो युवक उनके पास पहुंचा और हाथ जोडकर बोला ! आपसे कुछ सलाह लेनी थी ! संत ने पूछा तुम्हें गांव भर में कोई न मिला जो यहाँ चले आये ! युवक ने कहा - क्योंकि आप बुजुर्ग हैं जीवन में अच्छे बुरे का फर्क भी जानते हैं ! आपने एक लम्बा जीवन जिया है ! मैं एक विकट परिस्थिति में उलझ गया हूँ ! सम्भव है आप भी कभी ऐसी परिस्थिति में पड़े हों !
सो समाधान की सम्भावना आपके पास ज्यादा है ! यूँ तो मैं किसी से भी कहूँगा अपनी बात , तो कई समाधान मिल जायेंगे ! लेकिन मैं चाहता हूँ कि आपसे पूछूँ !
कल कुछ ऊंच -नीच हो तो मुझे तसल्ली रहे कि ये मेरा अकेले का निर्णय न था ! मैं कह सकूँगा कि फलां शख्स से तो पूछा था और उन्होंने हाँ ही कहा था !
आप अनुमति दें तो कुछ कहूँ ?
युवक ने कहना शुरू किया -बात बड़ी अटपटी सी है ! थोड़ी टेढ़ी भी है सो कहने में लज्जा आती है ! बात ये है कि एक परायी स्त्री है ! वैसे तो सारी स्त्रियाँ पराई ही होती हैं लेकिन ये इसलिए ज्यादा पराई है क्योंकि वो किसी और की पत्नी है ! और उसी पराये घर में रहती है ! हम दोनों को परस्पर प्रेम है और हम चाहते हैं अपने इस सम्बन्ध को थोडा और बढ़ा लें ! तो आपका इस विषय में क्या सुझाव है ? बढ़ जाऊँ आगे ?
सन्यासी ने गौर से उस युवक को देखा !और कहना शुरू किया !
मोती की दुकान में कोयला पूछ रहे हो !युवक थोडा घबडाया ! फिर बोला वो पराई है न इसलिए !!!
केवल स्त्री ही क्यों ? पराये तो तुम भी हो उस स्त्री के लिए ये प्रश्न उस स्त्री के लिए भी उतना ही जरुरी है बल्कि उसके लिए ही ज्यादा जरूरी है ! सोचता हूँ कितनी घातक होगी वो स्त्री जो किसी पराये पुरुष को ऐसा प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित कर रही हैं .युवक ने थोड़ी हिम्मत से कहा ! आप दोनों के बारे में ही कहें !
सन्यासी को लगा आज सुबह किसका मुंह देखा जो ऐसी चर्चा का कुअवसर हुआ !
जब दो लोग भ्रष्ट होने के लिए तैयार हो ही गये हो तो तीसरा क्या करेगा .
यदि जगे हुए होते तो ये प्रश्न ही न होता .
कोई आपको जहर पिलाना चाहता है तो आप किसी और से पूछकर निर्णय करेंगे ?
फिर भी यदि आप हाँ कहें तो !
जब विष का प्रभाव सर्व विदित है तो किसी के हाँ ना का क्या औचित्य !
क्या हमारे हाँ कहने से पहले आपने उस पराई स्त्री को राजी न किया होगा .
और यदि किया है तो ये प्रश्न किसी तीसरे की अदालत में क्यों .
इमानदारी अपनी अदालत में हो तो न्याय होता है .
फिर भी बार बार पूछे जाते हो ! क्यों ?
जो स्त्री अपने घर में संतुष्ट न हुई वो सूर्पनखा कहलाती है .
और वो पहला शिकार अपने आश्रय दाता को ही बनाती है .
आप बुद्धिमान है ,स्वतंत्र है .
जो रुचे सो करें !!!!!!
हम सब यही कर रहे हैं ,उचित अनुचित सब जानते हैं !परिणाम से परिचित हैं !
फिर भी पूछे चले जाते हैं !
महात्माओं से ,गुरुओं से !पंडितों से !
और कभी कभी तो परमात्मा से भी !
तू कहे तो मैं कहूँ 

#जीवनअनुभव 

Sunday, May 7, 2017

स्वयं से मिलना हो सकता है एक सुखद संयोग
पर तुमसे मिलना,कतई नहीं
यूँ तुम्हारा अंतस में समा जाना

अवश्य ही सुनिश्चित योजना रही होगी
उन आसमानों के फ़रिश्तों की
वरना कहाँ यूँ कोई आकर
ज़मीन के इंसा से मिला करता है
जीने का पवित्र पावन उद्देश्य सहसा ही मिल गया
बिखरा बिखरा सा जीवन,नीरस इक इक पल अव्यवस्थित
इक प्रेम-डोर में बँध सरस उल्लासित
मन पिघलने लगा, बूँद बूँद सिमटने लगा
बदल गई जमीं, बदल गया आसमान
बिना तुम्हारे बहुत अकेली हूँ
स्वयं में ही सिमटी रहती हूँ
जो कुछ दूर चलकर साथ छोड़ दे
उसके बिना चल पाना मुमकिन नहीं है
इंतज़ार ही उम्र भर का साथी बन गया है
मैं चल रही हूँ पर ये 'मन' ठहर गया है।

डॉ मंजु गुप्ता

Saturday, April 8, 2017

स्त्री
मातृस्वरुप संस्थिता होने के पश्चात
या सगर्भा होने के पश्चात
विष्णुस्वरूप आचार विचार वाले_ पुरुष का ही _सम्मान करती हैं !
और
कामी लम्पट (पति) को झटककर _ दूर फेंकती हैं !
_________
इसीलिए वेद कहता हैं -- तेरा ११वां पुत्र , तेरा पति ही हो !
ऋग्वेद में विवाह के समय वधू को आशीर्वाद दिया गया है,
‘दशास्याँ पुत्रन धेहि पतिमेकादशं कृधि ‘ (10.85,45)
अर्थात् हे इंद्रदेव ! इस स्त्री को दस पुत्र हों , जिससे पति इसका ग्यारहवाँ पुत्र होवे । ऋषि ने अपनी शुभकामना आशीर्वाद में अध्यात्म भाव को ही वरेण्य माना है। अध्यात्म की दृष्टि से, विवाह , मनुष्य की अंतर्निहित संवेदना को पूर्णता तक पहुँचाने के लिए है।
दस पुत्रों को जन्म देने और पति को ग्यारहवाँ पुत्र बना लेने वाले आशीर्वाद को तंत्र ने भी अपनाया है। वेद मंत्रों की नैतिक, मनोवैज्ञानिक और आदर्शवादी व्याख्या करने वालों के अनुसार मंत्र का आशय कामभावना का अतिक्रमण है।
विवाह का उद्देश्य यौन -जीवन में संयम-संतुलन रखते हुए कामभाव का परिमार्जन करना और उससे मुक्त हो जाना है। अध्यात्मविद् कहते हैं कि गृहस्थधर्म का भलीभाँति पालन किया गया हो तो उसकी परिणति कामभाव से मुक्ति के रूप में ही होगी।
तंत्र की मान्यता है कि कामभाव का सही उपयोग किया जाए, मूलाधार केंद्र में बैठी कुँडलिनी शक्ति को ऊर्ध्वगामी बनाया जाए, यौन संबंधों के रतिसुख को साक्षी भाव से देखे और उसका अतिक्रमण कर जाएँ, तो ऋषि का आशीर्वाद फलीभूत होता है । ऋषि ने वधू को आशीर्वाद दिया है कि वह दस पुत्रों की माँ बने और ग्यारहवाँ पुत्र उसका पति हो । इसी आशीर्वाद में पुरुष के भी कामभाव से मुक्त होने की कामना है। पत्नी यदि माँ बन जाएगी , तो पति में भी स्त्री के प्रति मातृत्व का भाव विकसित होगा। नैसर्गिक दृष्टि से संतान का संबंध माँ से ही होता है। स्थूल दृष्टि से पिता एक सामाजिक आवश्यकता भर है। स्थूल दृष्टि से माँ के संबंध में यह बात नहीं कही जा सकती। वह शरीर और समाज की दृष्टि से भी संतान की जाननी अभिभावक है। मंत्र में स्त्री का उल्लेख कर उसी मातृत्व को प्रतिष्ठा दी गई है।
इस युग में भी कई विभूतियों ने पत्नी को माँ के रूप में देखने या पति को पुत्र बना लेने वाली सिद्धियाँ हस्तगत की है। स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने विवाहित जीवन आरंभ करते ही पत्नी को महाशक्ति के रूप में देखा। उन्होंने संतान की कभी कामना नहीं की । लीलाप्रसंग में किसी ने उनसे पूछा भी सही कि माँ (शारदामणि) के मन में कभी संतान की इच्छा नहीं हुई। परमहंस ने कहा, माँ से ही पूछो न बाबा । मुझसे पूछते हो तो यही उतर है कि मैं उसका ही शिशु हूँ।
शास्त्रों और साधकों ने शक्ति की कामना स्त्री और माँ के रूप में की है। कोई भी साधक महाशक्ति को पत्नी या पुत्री के रूप में नहीं देखता । शक्ति के प्रति यह भाव जीवन-चेतना के सामान्य-स्वाभाविक आवेगों को पार कर संवेदना के उस क्षीरोदधि को पा लेने का भाव है जहाँ ममता, वात्सल्य, अनुग्रह और करुणा ही व्याप्त है। विविधता है, तो इन्हीं के तरल सघन रूपों में अन्यथा सर्वत्र एक स्नेहिल भाव है। वह भाव समर्पण और उसकी समुद्र समाना बूँद में जैसी सिद्धि तक पहुँचाता है।
ऋषि जब यह आशीर्वाद देते हैं। कि इस स्त्री के दस पुत्र उत्पन्न हों और पति ग्यारहवां पुत्र बने तो उसमें मातृत्व का ही आह्वान है। मंत्र का भाव यह है कि मातृत्व परिपक्व हो । परिपक्वता की कसौटी यह है कि संतान को देखकर तो वात्सल्य भाव आए ही, पति भी संतान की तरह दिखाई दे।
उपनिषदों में (संभवत: वृहदारण्य उपनिषद में) एक जगह आता है कि अमुक ऋषि (संभवतया लोमश ऋषि) ने कन्यादान के पश्चात विदा करते हुए अपनी शिष्या को यह आशीर्वाद दिया था-- जाओ, तुम्हारे दस पुत्र हों और ग्यारहवां पुत्र तुम्हारा पति हो।
Bindu sharma.

Wednesday, April 5, 2017

"इस्लाम के बारे में आप जानते ही क्या हैं? "
बहुत लंबे समय तक यह जुमला मुसलमानों का अचूक शस्त्र हुआ करता था, जिसका वार सहसा खाली नहीं जाता था । क्यूंकी हिन्दू की जानकारी भारतमें इस्लामी शासकों तक ही सीमित थी । उनके जुल्मों को ही ले कर बात करने की कोशिश करते थे और ऊपर लिखे एक ही सवाल में परास्त हो जाते थे ।
तब फिर उसे एक दया और उपहास के मिश्रण के भाव भंगिमा से समझाया जाता कि इस्लाम में ये है वो है, रसूल दया की मूरत थे , अपने दुश्मनों को भी माफ कर देते थे, कुरआन में ये लिखा है, वो लिखा है ...... आखिर में समझाया जाता था कि जिन सुलतानों की आप बात कर रहे हैं उनके वास्ते पूरी क़ौम को खराब न ठहराओ, और उन्होने जो किया उसके भी कारण तुम कहाँ जानते हो, तुम तो कुछ भी नहीं जानते ।
आदमी खिसियाना हो कर चला आता। लेकिन बाद में इंटरनेट आ गया। मोबाइल में भी गूगल आ गया । जमाना बदलने लगा । अब सवाल इतने मूर्खतापूर्ण न रहे । दया की मूरत की कलई उखाड़ने लगी, दुश्मनों को माफ कर देते थे या साफ कर देना ज्यादा पसंद होता था, सब कुछ समझ में आने लगा ।
चंद तानाशाहों के खातिर पूरी क़ौम को खराब न समझें या चंद शरीफों को देखकर पूरी कौम को शराफत का सर्टिफिकेट दे भी या नहीं - ऐसे भी सवाल अब तो बिलकुल जायज लगने लगे ।
"इस्लाम के बारे में आप जानते ही क्या हैं? "
यह जुमला पहले तलवार था, अब धीरे धीरे ढाल में तब्दील होने लगा। और वो ढाल भी पैने सवालों के सटीक प्रहारों से चिथड़ेहाल होने लगी, और अब ये तलवार हिन्दुओं के हाथों में है । आज वाकई ये सवाल मुसलमानों को ही पूछा जा रहा है कि "इस्लाम के बारे में आप जानते ही क्या हैं? " और दिख भी रहा है उन्हें भी वाकई कुछ पता नहीं है ।
“मिया गिरे तो भी टांग ऊपर”
ये मुहावरे को सार्थक कराते बेचारे तब कहने की कोशिश करते हैं कि आप लोगों को अरबी आती नहीं तो आलोचना मत करो, लेकिन हम अगर अनुवाद का text delete कर के केवल अरबी लिखाई सामने कॉपी पेस्ट कर दो तो शायद ही कोई पढ़ सकता है कि क्या लिखा है । तो भायलोग, आप को भी आता ही क्या है?
अरबी में लिखी आयतें तो काला अक्षर ऊंट बराबर है आप लोगों के लिए भी, आप भी अनुवाद ही पढ़ रहे हैं, उर्दू हुआ तो भी अनुवाद ही है, तो हम ने अङ्ग्रेज़ी में पढ़ा वो आप ने उर्दू में पढ़ा बात एक बराबर है क्योंकि हम भी मान्यवर मौलानाओं का किया हुआ अनुवाद ही पढ़ते हैं, फिरंगियों का किया नहीं । किस बात के समर्थन में मरने मारने के लिए तैयार हो जाते हैं आप? इस्लाम के बारे में आप भी जानते ही क्या हैं ? कम से कम हम तो सच जानते हैं, आप तो जो इमाम साहब कहे वो बिना कोई सवाल किये सच मानते हैं। हम बेहतर हैं आप से, क्योंकि हमारी भारतीय संस्कृति सत्य जानने की है, और आप की आयातित थोपी गई अरबी संस्कृति बिना कोई सवाल किए बस मानने की।
भारत का बहुत भला हो जाएगा अगर भारतीय मुसलमान भी इस्लाम के बारे में in depth जानने की कोशिश करें । क्योंकि बहुतांश भारतीय मुस्लिमों का DNA भारतीय ही है । और भारतीय दिमाग की यह परंपरा रही है कि वो उसी का सम्मान करता है जो वाकई सम्मान के योग्य हो । भारतीय मानस सवाल उठाता है और जो सम्मान के लायक नहीं होता उसे कूडेदान में फेंकते उसे तनिक भी देर नहीं लगती । अपनी भारतीयता से अरब का बुर्का हटाकर चार सवाल भी पूछा कीजिये, देश का भला हो जाएगा।
वंदे मातरम ! जय हिन्द !
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