!!ॐ शांति !!
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बड़ी पुरानी बात है एक गृहस्थ सन्यासी के पास एक युवक पहुंचा ! गृहस्थ इसलिए कि वो घर छोडकर जंगल में न गये थे ! तो युवक उनके पास पहुंचा और हाथ जोडकर बोला ! आपसे कुछ सलाह लेनी थी ! संत ने पूछा तुम्हें गांव भर में कोई न मिला जो यहाँ चले आये ! युवक ने कहा - क्योंकि आप बुजुर्ग हैं जीवन में अच्छे बुरे का फर्क भी जानते हैं ! आपने एक लम्बा जीवन जिया है ! मैं एक विकट परिस्थिति में उलझ गया हूँ ! सम्भव है आप भी कभी ऐसी परिस्थिति में पड़े हों !
सो समाधान की सम्भावना आपके पास ज्यादा है ! यूँ तो मैं किसी से भी कहूँगा अपनी बात , तो कई समाधान मिल जायेंगे ! लेकिन मैं चाहता हूँ कि आपसे पूछूँ !
कल कुछ ऊंच -नीच हो तो मुझे तसल्ली रहे कि ये मेरा अकेले का निर्णय न था ! मैं कह सकूँगा कि फलां शख्स से तो पूछा था और उन्होंने हाँ ही कहा था !
आप अनुमति दें तो कुछ कहूँ ?
युवक ने कहना शुरू किया -बात बड़ी अटपटी सी है ! थोड़ी टेढ़ी भी है सो कहने में लज्जा आती है ! बात ये है कि एक परायी स्त्री है ! वैसे तो सारी स्त्रियाँ पराई ही होती हैं लेकिन ये इसलिए ज्यादा पराई है क्योंकि वो किसी और की पत्नी है ! और उसी पराये घर में रहती है ! हम दोनों को परस्पर प्रेम है और हम चाहते हैं अपने इस सम्बन्ध को थोडा और बढ़ा लें ! तो आपका इस विषय में क्या सुझाव है ? बढ़ जाऊँ आगे ?
सन्यासी ने गौर से उस युवक को देखा !और कहना शुरू किया !
मोती की दुकान में कोयला पूछ रहे हो !युवक थोडा घबडाया ! फिर बोला वो पराई है न इसलिए !!!
केवल स्त्री ही क्यों ? पराये तो तुम भी हो उस स्त्री के लिए ये प्रश्न उस स्त्री के लिए भी उतना ही जरुरी है बल्कि उसके लिए ही ज्यादा जरूरी है ! सोचता हूँ कितनी घातक होगी वो स्त्री जो किसी पराये पुरुष को ऐसा प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित कर रही हैं .युवक ने थोड़ी हिम्मत से कहा ! आप दोनों के बारे में ही कहें !
सन्यासी को लगा आज सुबह किसका मुंह देखा जो ऐसी चर्चा का कुअवसर हुआ !
जब दो लोग भ्रष्ट होने के लिए तैयार हो ही गये हो तो तीसरा क्या करेगा .
यदि जगे हुए होते तो ये प्रश्न ही न होता .
कोई आपको जहर पिलाना चाहता है तो आप किसी और से पूछकर निर्णय करेंगे ?
फिर भी यदि आप हाँ कहें तो !
जब विष का प्रभाव सर्व विदित है तो किसी के हाँ ना का क्या औचित्य !
क्या हमारे हाँ कहने से पहले आपने उस पराई स्त्री को राजी न किया होगा .
और यदि किया है तो ये प्रश्न किसी तीसरे की अदालत में क्यों .
इमानदारी अपनी अदालत में हो तो न्याय होता है .
फिर भी बार बार पूछे जाते हो ! क्यों ?
जो स्त्री अपने घर में संतुष्ट न हुई वो सूर्पनखा कहलाती है .
और वो पहला शिकार अपने आश्रय दाता को ही बनाती है .
आप बुद्धिमान है ,स्वतंत्र है .
जो रुचे सो करें !!!!!!
हम सब यही कर रहे हैं ,उचित अनुचित सब जानते हैं !परिणाम से परिचित हैं !
फिर भी पूछे चले जाते हैं !
महात्माओं से ,गुरुओं से !पंडितों से !
और कभी कभी तो परमात्मा से भी !
तू कहे तो मैं कहूँ
#जीवनअनुभव
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बड़ी पुरानी बात है एक गृहस्थ सन्यासी के पास एक युवक पहुंचा ! गृहस्थ इसलिए कि वो घर छोडकर जंगल में न गये थे ! तो युवक उनके पास पहुंचा और हाथ जोडकर बोला ! आपसे कुछ सलाह लेनी थी ! संत ने पूछा तुम्हें गांव भर में कोई न मिला जो यहाँ चले आये ! युवक ने कहा - क्योंकि आप बुजुर्ग हैं जीवन में अच्छे बुरे का फर्क भी जानते हैं ! आपने एक लम्बा जीवन जिया है ! मैं एक विकट परिस्थिति में उलझ गया हूँ ! सम्भव है आप भी कभी ऐसी परिस्थिति में पड़े हों !
सो समाधान की सम्भावना आपके पास ज्यादा है ! यूँ तो मैं किसी से भी कहूँगा अपनी बात , तो कई समाधान मिल जायेंगे ! लेकिन मैं चाहता हूँ कि आपसे पूछूँ !
कल कुछ ऊंच -नीच हो तो मुझे तसल्ली रहे कि ये मेरा अकेले का निर्णय न था ! मैं कह सकूँगा कि फलां शख्स से तो पूछा था और उन्होंने हाँ ही कहा था !
आप अनुमति दें तो कुछ कहूँ ?
युवक ने कहना शुरू किया -बात बड़ी अटपटी सी है ! थोड़ी टेढ़ी भी है सो कहने में लज्जा आती है ! बात ये है कि एक परायी स्त्री है ! वैसे तो सारी स्त्रियाँ पराई ही होती हैं लेकिन ये इसलिए ज्यादा पराई है क्योंकि वो किसी और की पत्नी है ! और उसी पराये घर में रहती है ! हम दोनों को परस्पर प्रेम है और हम चाहते हैं अपने इस सम्बन्ध को थोडा और बढ़ा लें ! तो आपका इस विषय में क्या सुझाव है ? बढ़ जाऊँ आगे ?
सन्यासी ने गौर से उस युवक को देखा !और कहना शुरू किया !
मोती की दुकान में कोयला पूछ रहे हो !युवक थोडा घबडाया ! फिर बोला वो पराई है न इसलिए !!!
केवल स्त्री ही क्यों ? पराये तो तुम भी हो उस स्त्री के लिए ये प्रश्न उस स्त्री के लिए भी उतना ही जरुरी है बल्कि उसके लिए ही ज्यादा जरूरी है ! सोचता हूँ कितनी घातक होगी वो स्त्री जो किसी पराये पुरुष को ऐसा प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित कर रही हैं .युवक ने थोड़ी हिम्मत से कहा ! आप दोनों के बारे में ही कहें !
सन्यासी को लगा आज सुबह किसका मुंह देखा जो ऐसी चर्चा का कुअवसर हुआ !
जब दो लोग भ्रष्ट होने के लिए तैयार हो ही गये हो तो तीसरा क्या करेगा .
यदि जगे हुए होते तो ये प्रश्न ही न होता .
कोई आपको जहर पिलाना चाहता है तो आप किसी और से पूछकर निर्णय करेंगे ?
फिर भी यदि आप हाँ कहें तो !
जब विष का प्रभाव सर्व विदित है तो किसी के हाँ ना का क्या औचित्य !
क्या हमारे हाँ कहने से पहले आपने उस पराई स्त्री को राजी न किया होगा .
और यदि किया है तो ये प्रश्न किसी तीसरे की अदालत में क्यों .
इमानदारी अपनी अदालत में हो तो न्याय होता है .
फिर भी बार बार पूछे जाते हो ! क्यों ?
जो स्त्री अपने घर में संतुष्ट न हुई वो सूर्पनखा कहलाती है .
और वो पहला शिकार अपने आश्रय दाता को ही बनाती है .
आप बुद्धिमान है ,स्वतंत्र है .
जो रुचे सो करें !!!!!!
हम सब यही कर रहे हैं ,उचित अनुचित सब जानते हैं !परिणाम से परिचित हैं !
फिर भी पूछे चले जाते हैं !
महात्माओं से ,गुरुओं से !पंडितों से !
और कभी कभी तो परमात्मा से भी !
तू कहे तो मैं कहूँ
#जीवनअनुभव
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