Friday, May 12, 2017

 एक ज्वलंत प्रश्न --
"अपेक्षाएँ दुख का कारण होती हैं"
सही बात है परंतु सवाल ये है कि क्या अपेक्षा करने के इस स्वभाव को त्याग सकते हैं अगर सामाजिक ताने बाने में रहना है?
जाग्रत उत्तर -
Vijay Nanda यदि राजा जनक जैसा आचार विचार हो तभी यह संभव है वरना मोहमाया के विराट जंजाल से निकल पाना नामुमकिन है आप भिखारी को भीख देते समय भी एक आस रखते है दिल के किसी कोने में कि इसकी दुआ मिलेगी
वर्तमान दौर में देखे तो साधु संत भी किसी ना किसी आस में प्रवचन दे
रहे है
तो बहनजी यह सोचना कि समाज में रहकर वगैर आस के कोई भी इंसान कोई भी कर्म का निर्वहन कर रहा है एक भयानक भूल होगी
यह मेरा निजी विचार है
माता पिता का वंश विस्तार चाहना क्या है एक आस ही तो है कि मेरा वंश आगे बढ़ेगा राजा दशरथ भी इससे अछूते नही रहे
आस किसी भी प्रकार की हो सकती है मान मर्यादा की भूख , तारीफ की भूख , नाम की भूख , वासना की भूख , प्रेम की भूख ,अर्थाथ इंसान किसी ना किसी रूप में आस के समुंदर में समाया हुआ है

 Ajit Pathak-------
आशा हि परमं दु:खम ; नैराशयं परमं सु:खम ।। सभी दुखों का मूल कारण आशा यानि अपेक्षा ही है , ईस जगत के प्रति हमें नैराश्य ही रहना चाहिये । सुख का मूल कारण यही है अपेक्षा रहित । 
 
! लेकिन प्रश्न ये है कि क्या अपेक्षाओं को त्याग कर सह अस्तित्व के सिद्धांत का पालन हो सकता है . 
 
Ajit Pathak अस्ततित्व कैसा और किसका ,,, ईस शरीर का : जो नश्वर एवं मिथ्या है । और सत्य स्वरुप आत्मा तो स्वयं में सर्व अस्तित्व संपन्न है फिर उसे क्या जरुरत । । और जीव त्रिगुणात्मिका माया से वशीभूत हो , हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश से कभी दुखी तो कभी सुखी हो जाता है  
ये सब माया के अंतर्गत होने के नाते असत्यवत ही है । विशुद्ध रुप परमात्मा भगवान श्री कृष्ण के चरण कमल आश्रित जीव ईन सभी मायिक बंधनों से स्वत: मुक्त हो जाता है । और शरणागति होने के कारण सारे मूलभुत सिद्धांत एवं सारे भगवद गुण आ जाने के कारण वो सभी अवस्थाओं से परे हो जाता है । पर ,,,,,, सोई जानहिं जेहि देहु जनाई । जानत तुम्हहिं तुम्हहि होई जाई ।। श्री राधे ।।

बहुत ही अच्छा विवेचन ! लेकिन ये स्थूल दुनिया शरीरों से बनी है और सहस्तित्व का प्रश्न शरीरों के लिए ही रखा गया है !  
 -Anil Pradhan पहले हमें कृपया यह तय करना है कि हमें सत्य की ओर चलना है या क्षमा करिएगा दुनियां में रहना है या रहते हुए अपने मार्ग की ओर कदम बढ़ाने है।।
 Anil Pradhan होइहि सोइ जो राम रचि राखा
को करे तरक बढ़ावे साखा

स्वयं को शरीर मानने में ही उलझना है। अपेक्षाओं को त्याग कर भी सह-अस्तित्व के सिद्धांत का पालन हो सकता है।।
उसके लिए स्वयं को जीवन्मुक्त आत्मा मानकर एक दृष्टा की भाँति व्यव्हारित होना पड़ेगा।।
जिस हेतु स्थितप्रज्ञ की अवस्था में रहना आवश्यक है।।

स्वयं दृश्य बनने पर अटकना है।।

जो जैसा है उसे वैसा ही मानना लेकिन दृश्य में आसक्त न होना।
उमा कहहुँ मैं अनुभव अपना
सत हरि भजन जगत सब सपना

चरैवेति चरैवेति प्रचलामि निरन्तर ||
Ajit Pathak अपेक्षा निभाना ही परेगा यही तो माया है जिस दिन ये द्ंव्द खत्म हो जायेगी कि वास्तविक में सर्वरुप श्री हरि ही हैं तो हमारा कर्म स्वत: निष्काम हो जायेगा अथवा समस्त कर्म परमात्मा श्री कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए होगा । अर्थात माता पिता पुत्र पुत्री स्वजन सभी के रुप मे श्री हरि हि विद्यमान है उनकी सेवा भी श्री हरि सेवा है , ऐसा समझकर हम यहां रहते हुए भी अपेक्षारहित जीवन जी सकते हैं और कर्मफल के बंधनों से भी मुक्त हो सकते हैं । जय जय श्री राधे
स्थूल जगत और सुक्ष्म जगत में थोङा थोङा भेद है ं। सूक्ष्म शरीर और जगत भी मायायुक्त ही है । माया युक्त जीव ईसी स्थूल जगत और शरीर के लिए अपेक्षाए रखता है और कर्म करता है । और जो थोङा बहुत ज्ञानी है वो स्थूल को मायिक मानते हुए परलोक और सूक्ष्म जगत के लिए आपेक्षित हो कर्म करता है और वो भी नित्य आनंद न पाकर कर्मफल भोग दुखी ही हो जाता है और पतन करवा लेता है । यहां तो ईन सबसे परे श्री कृष्ण भक्ति ही करनी चाहिये । न कोई आशा न कोई अपेक्षा मान अपमान से परे सब में श्री हरि को देखते हुए वात विवाद से बचते हुए , श्री हरि की चिंतन करनी चाहिये । फिर ईस शरीर के लिए प्रश्न हि क्या बचेगा । जो हो हरि कृपा ।। जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिये ।

! आपकी बात अक्षरशः सत्य है ! लेकिन दुनियां का सिद्धांत इसमें बाधक है ! वो कहती है आप मुझसे अपेक्षा न रखें ये आप की बात !! लेकिन जब तक आप यहाँ हैं आपको हमारी अपेक्षाओं से निभाना ही पड़ेगा !
 
    शरीर के लिए प्रश्न कैसा ?? जो नाशवान है , क्षणिक है , विद्वान उस चक्कर में नहीं परते । जो नित्य है सत्य है शास्वत है मुक्त है परमात्मा का अंश है वो परमात्मा तक कैसे पहुंचे ,, अति सुगम क्या मार्ग हो वहां तक पहुंचने के लिए हमें ईन प्रश्नों का हल ढुंढना चाहिये । मुझ अल्पमति को तो श्री हरि ने यही सुझाया है । जय जय श्री राधे ।
 
Ajit Pathak या सभी संसारी जनों को मायावत मान सभी से परे होकर एककांत श्री कृष्ण चिंतन ही करना चाहिये । वही मायापति हैं उन्ही की ईच्छा से माया भागेगी अन्यथा स्वत: कुछ नहीं होगा । दैवीह्रोषागुणमयी मम माया दुरत्यया । मामैव ये प्रपद्यंते मायार्मेतां तरंतिते ।। गीता ।।   
                     
आज कितने दिनों में आपकी दिव्य वाणी का रसास्वादन मिला !जय हो ! 🙏🙏                                                    
 अब आप ही कहें ! इस सुंदर सत्संग की अपेक्षा कोई छोड़ सकता है ! हमें आपसे यही अपेक्षा थी ! धन्य घडी सोई जब सतसंगा ..
सतसंगति के समान तो और कुछ भी नहीं । संतसंगति अति दुर्लभं । मुक्ति पाना आसान हो सकता है पर सत्संग का एक क्षण मिलना भी अति दुर्लभ ।
विन सत्संग विवेक न होई । राम कृपा विन सुलभ न सोई ।।
विषय को त्याग केवल श्री हरि चर्चा ही कलि में श्रेष्टतम है । उमा कहहुं वे लोग अभागी । हरिपद छोङ विषय अनुरागी ।। श्री राधे ।।
Anil Pradhan मुखों पवित्रं यदि राम नामं
हृदयो पवित्रं यदि ब्रह्म ज्ञानं
चरणौ पवित्रं यदि तीर्थ गमनं

हस्तौ पवित्रं यदि पुण्य दानं

धन्य घड़ी सोइ जब सत्संगा
धन्य जनम द्विज भगति अभंगा

अब मोहि भा भरोस हनुमंता....
बिनु हरि कृपा मिलहिं नहिं संता....
विषय को त्याग केवल

श्री हरि
चर्चा ही कलि में श्रेष्टतम है ।
उमा कहहुं वे लोग अभागी ।
हरिपद छोङ विषय अनुरागी ।। श्री राधे ।।

     Ajit Pathak जय हो जय हो । मुख से कर गुणगान ,, ह्रदय में रख श्री कृष्ण रति । चरण से धाम हस्त से दान ,, कब समझेगा मंदमति ।। श्री हरि से यही प्रार्थना हैं 
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इति वार्ता :
जय जय श्री राधे गोविन्द .

 

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