Thursday, October 5, 2017

दुष्ट की मित्रता कहें !अथवा ये कहें कि  दुष्ट  मित्र  सदा  घातक  ही  होता  है  !
ये बात चाहे  जिस सन्दर्भ में रखी जाये हर स्थिति के लिए एक जैसी प्रभाशाली है ! आपके घर में, पड़ोस में कोई व्यक्ति हो सकता है इस दुष्ट प्रवृत्ति का ! जिसे यदि समय रहते न पहचाना जाये तो उसे सहन करना हमारी विवशता बन जाती है ! श्री राम चरितमानस के अरण्यकांड में बाबा तुलसी लिखते हैं ----

दसमुख गयउ जहाँ मारीचा !नाइ माथ स्वारथ रत नीचा !!

वो रावण जो कभी किसी के सामने न झुका वो आज मारीच के पास आया है स्वयं चलकर ! घोर आश्चर्य है और उससे भी बड़ा आश्चर्य कि आगे बढकर मारीच को सिर नवाकर प्रणाम भी कर रहा है !
हम मनुष्य होने का दम्भ भरते हैं ! पता नहीं कहाँ कहाँ की सूक्तियां ,लोकोक्तियाँ कंठस्थ किये फिरते हैं ! लेकिन व्यवहार में कुछ चतुराई विवेक दीख नहीं पड़ता !
कोई थोडा सा प्रभावशाली व्यक्ति भी हमसे मिलने आ जाये ! आ जाये क्या बुलवा कर दरवाजे पर ही खड़ा कर ले तो स्वयं को #जय विजय से ऊपर की चीज समझ बैठते हैं !
मारीच राक्षस कुल में उत्पन्न है ! घोर अघ योनी है ! राक्षस तो है ही इसमें कहीं कोई संदेह नहीं है ! लेकिन मारीच का विवेक जाग्रत है ! वो दशानन को आया जानकर प्रत्यक्ष में तो प्रसन्नता व्यक्त करता है लेकिन उसका झुकना मारीच को सचेत कर देता है ! रावण का मारीच की गुफा पर आना मारीच के लिए प्रसन्नता नहीं अपितु चिंता का विषय है ! मारीच मन ही मन विचार करता है ------

नवनि नीच कै अति दुःखदाई ! जिमि अंकुस धनु उरग बिलाई !!

नीच का झुकना भी उसी प्रकार दुखदायी होता है ! जैसे अंकुश ,धनुष सांप और बिल्ली !
ये सब जब जब झुकते हैं हानि ही देकर जाते हैं अर्थात ये शिकार पर घात लगाने के लिए ही झुके से प्रतीत होते हैं

भयदायक खल कै प्रिय बानी ! जिमि अकाल के कुसुम भवानी !!

भगवान शंकर माँ पार्वती को शत्रु के प्रति सचेत रहने की सीख देते हुए कहते हैं कि हे भवानी ! दुष्ट की मीठी वाणी भी उसी प्रकार भय देने वाली होती है ,जैसे बिना ऋतु के फूल !
इसलिए जिसकी प्रकृति से आप परिचित हैं उससे सावधान रहना चाहिए ! विशेष कर सर्प को भगवान समझ कर पूजाघर में स्थान नहीं देना चाहिए !
नमो नारायण !

लेखन स्वान्तः सुखाय है ! आप चाहें तो इसे देशके वर्तमान परिपेक्ष्य में रख कर पढ़ सकते हैं !














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