#राम लीला ...
साधारण से विशिष्ठ बनना सरल नही एक तप है । जैसे कल कहा जलन अच्छी है अगर हम किसी कि अच्छाइयों से जलकर उससे भी ज्यादा अच्छा बनना चाहें । सरल नही ये मार्ग पर असम्भव भी तो नही । समय के साथ साथ यदि हम अपनी कमियों को समझकर उनका अंत करते जाएँ तो अच्छे से और अच्छे होते जाते हैं । सोचो प्रतिदिन एक बुराई को भी खत्म करें तो 365 बुराइयों पर तो वर्षभर में विजय पा लें .....
~ बड़ी अद्भुत है विश्वामित्र और वशिष्ठ की कथा । विश्वामित्र वशिष्ठ को पराजित करने की मंशा त्याग आत्म-शुद्धि के अथक प्रयत्न में संलग्न हो गये जिससे रजस की वृत्ति सत्व में परिवर्तित हो सके । यह विश्वामित्र की स्वयँ पर पहली विजय थी पर स्वयँ को सिद्ध करने की उनकी इच्छा ही उनकी एकमेव प्रेरणा थी । उनके समक्ष था वशिष्ठ का ब्रह्म दंड जिसने ब्रह्मास्त्र को भी निगल लिया था । कठिन और लम्बी तपस्चर्या के उपरान्त भी विश्वामित्र सन्तुष्ट नहीं थे और दिन प्रति दिन अपनी तपस्या भीषण और भीषण करते जाते । प्रवृति पर अन्तर से बाहर की ओर पूर्ण विजय की जगह उनकी तपस्या एक हठयोग थी, एक बाल हठ जो दिन प्रति दिन दृढ़तर होती जाती । आखिर परेशान हो कर देवताओं ने उन्हें दिगभ्रमित करने मेनका को उनके समक्ष भेजा जिससे ऋषि के तपस्चर्या की परीक्षा हो सके । हठयोगी विश्वामित्र क्षण भर भी टिक ना पाये। मेनका ने तपस्वी विश्वामित्र को सम्मोहित कर लिया और वर्षों तक ऋषि उसी भ्रम में जीते रहे । सदा-सर्वदा के लिए यह उदाहरण बन गया, दृष्टान्त बन गया। आज भी कहते हैं - इस सम्मोहन से विश्वामित्र भी नहीं बच पाये, सामान्य मनुष्यों की क्या बिषात।
पर प्रत्येक भ्रम का कभी ना कभी अन्त तो होता ही है, विश्वामित्र भी मोह-निद्रा से जागे पर उन्होंने मेनका को क्षमा दान दिया । ऋषि ने स्वयँ को ही दोषी मान अपनी तपस्या को और कठिन करने का संकल्प लिया । यह ऋषि की स्वयँ पर दूसरी विजय थी। बड़ा सन्देश था विश्वामित्र के पुनर्प्रयासों में - अगर आत्मप्रेरणा हो तो मनुष्य की एक हार उसका अन्त नहीं होती ।
सहस्त्रों वर्षों की तपस्या के बाद जब विश्वामित्र परम-पद के पास जा पहुँचे तो आखिरी परीक्षा के रूप में इन्द्र के दरबार की रम्भा उनके समक्ष आयी । विश्वामित्र सम्मोहित या भ्रमित नहीं हुए पर क्रुद्ध हो उठे, जल उठे। मेनका के द्वारा प्राप्त पराजय की पीड़ा ज्वलन्त हो उठी। उन्होंने आवेश में अपने तेज की प्रखरता से उसे जड़ कर दिया और क्रोधातुर हो उसे भीषण शाप दिया । यह विश्वामित्र की पराजय थी, क्रोध ने उन्हें पुनः स्खलित कर दिया था । आवेश का, क्रोध का, उद्वेग का नियमन और नियंत्रण ना हुआ तो वह मनुष्य की हार है, पराजय है। नतमस्तक हो विश्वामित्र ने पराजय स्वीकार किया और पुष्कर धाम छोड़ हिमालय पर चले गए जहाँ उन्होंने विचार और स्वाँस त्याग कर तपस्चर्या की। एक राजा अपने संकल्प शक्ति और अनथक प्रयासों से महर्षि हो गया। उसने कठिनतम तपस्या से अपने गुण-धर्म, प्रवृति और संस्कार बदल लिये। आत्म-अवलोकन, आत्म-परिष्कार और आत्म -संशोधन से उन्होंने पूर्णता प्राप्त कर ब्रह्मा और देवों को संतुष्ट किया और आखिर ब्रह्मर्षि का पद प्राप्त किया।
उन्हें सर्वप्रथम वशिष्ठ ने शुभकामना देते हुए एक महान ऋषि कहा और उनकी तपस्या को ब्रह्माण्ड में हुई कठिनतम तपस्या घोषित किया । वशिष्ठ द्वेष और प्रतिद्वंदिता से परे थे। महापुरुष कभी किसी से तुलना नहीं करते क्योंकि वे जानते हैं कि सृष्टि में प्रत्येक जीव अपने अस्तित्व, भाग्य, भवितव्य और विशिष्टता के साथ आता है अतः कोई किसी का विकल्प या प्रतिद्वंदी तो चाह कर भी नहीं बन सकता। राजा दशरथ के दरबार में विश्वामित्र द्वारा राम को आश्रम में ले जाने के आग्रह पर जब दशरथ तैयार नहीं हुए तो वशिष्ठ ने ही दशरथ को समझाया, " महाराज दशरथ ! विश्वामित्र मनुष्य रूप में तपस्या हैं, तीनो लोक में इनके समान योद्धा या तपस्वी कभी हुआ ही नहीं। मैंने स्वयँ इनके दिव्यास्त्रों की क्षमता का अनुभव किया है अतः राम इनके साथ पूर्णतः सुरक्षित हैं। ये स्वयँ समस्त राक्षसों के विनाश में सक्षम हैं पर यदि वे राम को माध्यम बनाना चाहते हैं तो इसमें नियन्ता ने कुछ शुभ संकेत छुपा रखा है। अतः राम को ऋषि के साथ भेजने में तनिक भी संकोच करना अनुचित है।" वशिष्ठ को विश्वामित्र की प्रसंशा करते हुए क्षणमात्र भी अपने पद, अस्तित्व, प्रतिष्ठा और पुरानी कटुता की चिन्ता नहीं हुई। यही सच्ची प्रतिभा और उत्कृष्टता का प्रथम लक्षण है।
साभार ..
#बिंदु जी की वाल से !
साधारण से विशिष्ठ बनना सरल नही एक तप है । जैसे कल कहा जलन अच्छी है अगर हम किसी कि अच्छाइयों से जलकर उससे भी ज्यादा अच्छा बनना चाहें । सरल नही ये मार्ग पर असम्भव भी तो नही । समय के साथ साथ यदि हम अपनी कमियों को समझकर उनका अंत करते जाएँ तो अच्छे से और अच्छे होते जाते हैं । सोचो प्रतिदिन एक बुराई को भी खत्म करें तो 365 बुराइयों पर तो वर्षभर में विजय पा लें .....
~ बड़ी अद्भुत है विश्वामित्र और वशिष्ठ की कथा । विश्वामित्र वशिष्ठ को पराजित करने की मंशा त्याग आत्म-शुद्धि के अथक प्रयत्न में संलग्न हो गये जिससे रजस की वृत्ति सत्व में परिवर्तित हो सके । यह विश्वामित्र की स्वयँ पर पहली विजय थी पर स्वयँ को सिद्ध करने की उनकी इच्छा ही उनकी एकमेव प्रेरणा थी । उनके समक्ष था वशिष्ठ का ब्रह्म दंड जिसने ब्रह्मास्त्र को भी निगल लिया था । कठिन और लम्बी तपस्चर्या के उपरान्त भी विश्वामित्र सन्तुष्ट नहीं थे और दिन प्रति दिन अपनी तपस्या भीषण और भीषण करते जाते । प्रवृति पर अन्तर से बाहर की ओर पूर्ण विजय की जगह उनकी तपस्या एक हठयोग थी, एक बाल हठ जो दिन प्रति दिन दृढ़तर होती जाती । आखिर परेशान हो कर देवताओं ने उन्हें दिगभ्रमित करने मेनका को उनके समक्ष भेजा जिससे ऋषि के तपस्चर्या की परीक्षा हो सके । हठयोगी विश्वामित्र क्षण भर भी टिक ना पाये। मेनका ने तपस्वी विश्वामित्र को सम्मोहित कर लिया और वर्षों तक ऋषि उसी भ्रम में जीते रहे । सदा-सर्वदा के लिए यह उदाहरण बन गया, दृष्टान्त बन गया। आज भी कहते हैं - इस सम्मोहन से विश्वामित्र भी नहीं बच पाये, सामान्य मनुष्यों की क्या बिषात।
पर प्रत्येक भ्रम का कभी ना कभी अन्त तो होता ही है, विश्वामित्र भी मोह-निद्रा से जागे पर उन्होंने मेनका को क्षमा दान दिया । ऋषि ने स्वयँ को ही दोषी मान अपनी तपस्या को और कठिन करने का संकल्प लिया । यह ऋषि की स्वयँ पर दूसरी विजय थी। बड़ा सन्देश था विश्वामित्र के पुनर्प्रयासों में - अगर आत्मप्रेरणा हो तो मनुष्य की एक हार उसका अन्त नहीं होती ।
सहस्त्रों वर्षों की तपस्या के बाद जब विश्वामित्र परम-पद के पास जा पहुँचे तो आखिरी परीक्षा के रूप में इन्द्र के दरबार की रम्भा उनके समक्ष आयी । विश्वामित्र सम्मोहित या भ्रमित नहीं हुए पर क्रुद्ध हो उठे, जल उठे। मेनका के द्वारा प्राप्त पराजय की पीड़ा ज्वलन्त हो उठी। उन्होंने आवेश में अपने तेज की प्रखरता से उसे जड़ कर दिया और क्रोधातुर हो उसे भीषण शाप दिया । यह विश्वामित्र की पराजय थी, क्रोध ने उन्हें पुनः स्खलित कर दिया था । आवेश का, क्रोध का, उद्वेग का नियमन और नियंत्रण ना हुआ तो वह मनुष्य की हार है, पराजय है। नतमस्तक हो विश्वामित्र ने पराजय स्वीकार किया और पुष्कर धाम छोड़ हिमालय पर चले गए जहाँ उन्होंने विचार और स्वाँस त्याग कर तपस्चर्या की। एक राजा अपने संकल्प शक्ति और अनथक प्रयासों से महर्षि हो गया। उसने कठिनतम तपस्या से अपने गुण-धर्म, प्रवृति और संस्कार बदल लिये। आत्म-अवलोकन, आत्म-परिष्कार और आत्म -संशोधन से उन्होंने पूर्णता प्राप्त कर ब्रह्मा और देवों को संतुष्ट किया और आखिर ब्रह्मर्षि का पद प्राप्त किया।
उन्हें सर्वप्रथम वशिष्ठ ने शुभकामना देते हुए एक महान ऋषि कहा और उनकी तपस्या को ब्रह्माण्ड में हुई कठिनतम तपस्या घोषित किया । वशिष्ठ द्वेष और प्रतिद्वंदिता से परे थे। महापुरुष कभी किसी से तुलना नहीं करते क्योंकि वे जानते हैं कि सृष्टि में प्रत्येक जीव अपने अस्तित्व, भाग्य, भवितव्य और विशिष्टता के साथ आता है अतः कोई किसी का विकल्प या प्रतिद्वंदी तो चाह कर भी नहीं बन सकता। राजा दशरथ के दरबार में विश्वामित्र द्वारा राम को आश्रम में ले जाने के आग्रह पर जब दशरथ तैयार नहीं हुए तो वशिष्ठ ने ही दशरथ को समझाया, " महाराज दशरथ ! विश्वामित्र मनुष्य रूप में तपस्या हैं, तीनो लोक में इनके समान योद्धा या तपस्वी कभी हुआ ही नहीं। मैंने स्वयँ इनके दिव्यास्त्रों की क्षमता का अनुभव किया है अतः राम इनके साथ पूर्णतः सुरक्षित हैं। ये स्वयँ समस्त राक्षसों के विनाश में सक्षम हैं पर यदि वे राम को माध्यम बनाना चाहते हैं तो इसमें नियन्ता ने कुछ शुभ संकेत छुपा रखा है। अतः राम को ऋषि के साथ भेजने में तनिक भी संकोच करना अनुचित है।" वशिष्ठ को विश्वामित्र की प्रसंशा करते हुए क्षणमात्र भी अपने पद, अस्तित्व, प्रतिष्ठा और पुरानी कटुता की चिन्ता नहीं हुई। यही सच्ची प्रतिभा और उत्कृष्टता का प्रथम लक्षण है।
साभार ..
#बिंदु जी की वाल से !
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