परम लाभ दिलानेवाले पंच पर्वों का पुंज : दीपावली......
भारतीय जनमानस में जैसे राम रमे हैं वैसे ही रमी है दीपावली ! मुख्य रूप से पांच दिन चलने वाला ये उत्सव इस्लाम को छोडकर हर सम्प्रदाय में किसी न किसी रूप में विद्यमान है ही ! जैन धर्म में इसे महावीर जी का निर्वाण दिवस मानते हैं तो सिक्ख इसे सिक्खों के छ्टवे गुरु श्री हरगोविंद जी की रिहाई के उपलक्ष्य में प्र्काशपर्व के रूप में मनाते हैं
जैन और सिख धर्म के साथ-साथ बौध धर्म के लोगों में भी दीपावली को लेकर अलग मान्यता है । इनकी मान्यता के अनुसार बौध धर्म के प्रवर्तक भगवान गौतम बुद्ध 17 साल बाद इसी दिन अपने अनुयायीयों के साथ अपने गृह नगर कपिलवस्तु पहुचें थे। इस अवसर पर बौध धर्म के अनुयायीयों ने लाखों दीप जलाकर उनका स्वगात किया था। तभी हर साल बौध धर्म के लोग इस दिन को धूम-धाम से मनाते है।
पोस्ट लम्बी हो जाएगी इसलिए अब आते हैं मूल विषय अर्थात हिन्दुओं में पंच पर्व का महत्व .
हिन्दुओं में दीपावली श्री राम के वनवास से अयोध्या लौटने के उपलक्ष्य में मनाई जाती है ये सर्व विदित और सर्वमान्य तथ्य है !
तर्क कुतर्क तो होते ही रहते हैं लेकिन आज कुछ चर्चा इन पंच पर्वों और श्रीराम के सम्बन्ध के व्यवहारिक पक्ष पर .....
जब श्री राम अयोध्या छोडकर गये तो उससे पहले अयोध्या में राम के राज्याभिषेक के लिए तैयारियां हो रही थी चहुँ और उत्सव का वातावरण था ! नगर में जहाँ तहां तोरण के लिए झंडियाँ, झालरें केले के तने आदि गाड़ियों से भरभर कर लाये जा रहे थे ! कहीं मार्गों को सजाने के लिए रंगों के पात्र भर भर कर रखे थे ! कहीं वस्त्रों के गट्ठर गाड़ियों में भरे हुए आ रहे थे ! पकवान बनने के लिए भंडार घर में नये नये खाद्य पदार्थ लाये जा रहे थे !
आचार्यों और देश विदेश के राजाओं के लिए सिंघासन सजाये जा रहे थे ! मार्गों को सुदृढ़ किया जा रहा था ! राम के राज्याभिषेक की तैयारियां युद्ध स्तर पर हो रही थीं और हों भी क्यों न भला ! चक्रवर्त्ती सम्राट राजा दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र का राज्याभिषेक है !
इसे आप अपने घर में ही होने वाले किसी उत्सव की कल्पना करके समझ सकते हैं ! जब हम बिना किसी परिचय के इतना तामझाम जोड़ते हैं तो अयोध्या की तो बात ही क्या !
अयोध्या ,वही अयोध्या जो त्रिलोक विजयी रावण के रहते भी स्वतंत्र थी ! आप समझ सकते हैं अयोध्या क्या थी !
अब इतने बड़े उत्सव की रूपरेखा साकार होने ही लगी थी कि अकस्मात श्री राम का वन गमन और महाराज दशरथ का देहांत दोनों घटनाएँ इतनी आकस्मिक थीं कि किसी को कुछ सोचने समझने का अवसर ही नहीं मिला ! ये कुछ ऐसा था जैसे बारात आने की तैयारी हो और ......
आप समझ सकते हैं !
कहते हैं अयोध्या में श्री राम के जाने के बाद से वापिस लौटने तक मृत्यु के अतिरिक्त कोई संस्कार नहीं हुआ !
उत्सव की तैयारी के लाये गये सभी सामान जहाँ तहां पड़े पड़े कूड़े के ढेर में बदल गये !
लोग बस उनके लौटने की प्रतीक्षा में अपने प्राणों को रखे हुए थे ! इसके लिए सबका अपना तरीका था ! कहीं कोई सामजस्य नहीं था !
भरत जी धरती में गड्ढा खोदकर निवास कर रहे थे तो उर्मिला ने मौन तपस्या को माध्यम बना लिया था ! मांडवी माताओं की सेवा में रत थीं तो शत्रुघ्न और श्रुतकीर्ति ने राज्य और महल की व्यवस्था को बनाये रखने में ही स्वयं को होम कर दिया था !
कल्पना कीजिये जिस देश में चौदह वर्षों से कोई विवाह न हुआ हो कोई जन्म न हुआ हो ! कोई अतिथि न आया हो उस देश ,नगर और घर की हालत क्या हो गयी होगी ! ऐसे में जब हनुमान जी से भरत को राम- रावण के संग्राम की सूचना मिली तो मानों मुर्दों में स्पंदन लौटने लगे ! निराश से पड़े जनजीवन में चेतना लौटने लगी ! हनुमान जी तो चले गये संजीवनी बूटी लेकर लेकिन शत्रुघ्न जी ने अपने गुप्तचर उनके पीछे कर दिए ! वो युद्ध की प्रत्येक सूचना अयोध्या पहुंचा रहे थे ! जिस दिन रावण का वध हुआ ! उस दिन अयोध्या में पहली बार प्रजा का हर्षमिश्रित शोरगुल सुना गया !
अब श्री राम के लौटने की अवधि भी निकट आ रही थी ! लोगों ने पहली बार अपने आस पास दृष्टि डाली तो पता चला ये वो अयोध्या तो न रही जिसमें राम रहते थे ! जिसमें जनकनन्दिनी वधु बनकर आयीं थीं ! पूरा नगर कबाड़ के ढेर में बदल चुका था ! लोगों को स्वयं पर आक्रोश भी आया और ग्लानी भी !
बस फिर तो पूरे नगर को सजाने का वो महोत्सव जो चौदह वर्ष पहले बीच में ही खंडित हो गया था उसे पुन: आरम्भ किया गया !
नगर द्वार देहरियाँ सब सजने लगे !सबसे पहले वो सब सामग्री हटाई गयी जो श्रीराम के अचानक चले जाने से अयोध्या में मातम का संदेश दे रही थी ! फिर रंग रोगन आदि से घरों गलियों को साफ़ सुथरा बनाया गया ! लोगो ने पुरानी वस्तुओं को हटाकर नई नई वस्तुओं की खरीदा ! सूनी पड़ी अयोध्या में हाट बाजार जीवित होकर गुनगुना उठे ! मन्दिरों में घंटे घडियाल बजने लगे !
सरयू के घाट फिर जग पड़े !
जिसे नरकचौदस कहा गया उस दिन लोगों ने अयोध्या की सारी कालिमा को समेटकर सरयू में बहा दिया ! अयोध्या के साथ साथ अयोध्या का सारा जीवन रूपवान होकर चमचमा उठा ! माताओं ने अखंड दीपक जलाये ! और जाप आरम्भ हुए ! वो जानती हैं अब प्रार्थना की ज्यादा जरूरत है !
शायद अति उल्लास से भी डरती हैं कहीं अपनी ही नजर न लग जाये !
दीपावली की काली अंधियारी रात को इतना रोशन और जगमग कर दिया गया है कि विधाता को अपना पत्रा निकालकर निश्चित करना पडा कि आज अमावस्या ही है !
प्रतीक ये भी कि घोर निराशा में भगवान भी तभी आते हैं जब हम स्वागत के लिए उल्लास के दीये जलाये रखें !
अब थोडा आगे !!!!!!!!!!
आज भी यदि कोई यात्रा से लौटता है तो कुछ नियम हैं जिनका पालन सभी करते हैं ! तो राम जब लौटे तो रात्रि में स्वागत की प्रक्रिया ही इतनी लम्बी हो गयी कि पूरी रात्रि बीत गयी ! अगले दिन सबसे पहले श्रीराम को गौशाला में ले जाया गया जहाँ वो गुरुजनों और नगर वासियों के साथ मिलकर गौसंवर्धन का महत्व स्थापित करते हुए प्रभु का आभार प्रकट करते हैं ! आज भी भारतीय जन मानस में गौ को सबसे अधिक पूजनीय माना जाता है ! वो तो स्वयं श्रीराम का युग था ! आज भी जो किसी को एक पैसा न दे कहीं प्रणाम न करे वो भी गौसेवा कर लेता है कभी न कभी !
अब इतने लम्बे वन प्रवास और लौटने के उल्लास में भी एक आवश्यक घटक जो हमारी जीवन रेखा है छूट गया ! लेकिन भगवान श्रीराम को वो याद है ! और वो हैं अयोध्या की बेटियां !
हमारे समाज में पहले बेटियां विवाह के पश्चात जीवन भर मायके नहीं लौटती थी मायके वाले ही समय समय पर उनकी कुचल क्षेम पूछने के लिए जाया करते थे लेकिन चौदह वर्षों से अयोध्या की बेटियां भी तरस गयी हैं अपने भाइयों के दर्शन और कुशलता पाने को !
तब श्री राम ने गुरुजनों की आज्ञा लेकर समस्त राज्य के पुरुषों को ये संदेश भिजवाया कि आज के दिन जो भी भाई अपनी बहन के घर भोजन करेगा उसे यमराज का भी भय न रहेगा ! ये मेरा वचन है !
सब लोग हर्ष मिश्रित क्षमा याचना के साथ अपनी बहनों के घर गये हैं ! बहनें पक्के नारियल से उनकी नजर उतारकर कर उन्हें आशीर्वाद दे रहीं हैं !
क्योंकि इतने वर्षों बाद भाई अचानक आया है तो बहने भी हतप्रभ सी हैं ! क्या खिलाना है कहाँ बैठाना है कुछ समझ ही नहीं पा रही हैं !
ये पंच पर्व इतना साधारण नहीं है जितना दीखता है !
ये सनातन जन मानस का पूरा जीवन चरित्र स्वयं में समेटे हुए है !
समझें और गर्व करें अपनी संस्कृति पर !!!!
सादर नमो नारायण !
भारतीय जनमानस में जैसे राम रमे हैं वैसे ही रमी है दीपावली ! मुख्य रूप से पांच दिन चलने वाला ये उत्सव इस्लाम को छोडकर हर सम्प्रदाय में किसी न किसी रूप में विद्यमान है ही ! जैन धर्म में इसे महावीर जी का निर्वाण दिवस मानते हैं तो सिक्ख इसे सिक्खों के छ्टवे गुरु श्री हरगोविंद जी की रिहाई के उपलक्ष्य में प्र्काशपर्व के रूप में मनाते हैं
जैन और सिख धर्म के साथ-साथ बौध धर्म के लोगों में भी दीपावली को लेकर अलग मान्यता है । इनकी मान्यता के अनुसार बौध धर्म के प्रवर्तक भगवान गौतम बुद्ध 17 साल बाद इसी दिन अपने अनुयायीयों के साथ अपने गृह नगर कपिलवस्तु पहुचें थे। इस अवसर पर बौध धर्म के अनुयायीयों ने लाखों दीप जलाकर उनका स्वगात किया था। तभी हर साल बौध धर्म के लोग इस दिन को धूम-धाम से मनाते है।
पोस्ट लम्बी हो जाएगी इसलिए अब आते हैं मूल विषय अर्थात हिन्दुओं में पंच पर्व का महत्व .
हिन्दुओं में दीपावली श्री राम के वनवास से अयोध्या लौटने के उपलक्ष्य में मनाई जाती है ये सर्व विदित और सर्वमान्य तथ्य है !
तर्क कुतर्क तो होते ही रहते हैं लेकिन आज कुछ चर्चा इन पंच पर्वों और श्रीराम के सम्बन्ध के व्यवहारिक पक्ष पर .....
जब श्री राम अयोध्या छोडकर गये तो उससे पहले अयोध्या में राम के राज्याभिषेक के लिए तैयारियां हो रही थी चहुँ और उत्सव का वातावरण था ! नगर में जहाँ तहां तोरण के लिए झंडियाँ, झालरें केले के तने आदि गाड़ियों से भरभर कर लाये जा रहे थे ! कहीं मार्गों को सजाने के लिए रंगों के पात्र भर भर कर रखे थे ! कहीं वस्त्रों के गट्ठर गाड़ियों में भरे हुए आ रहे थे ! पकवान बनने के लिए भंडार घर में नये नये खाद्य पदार्थ लाये जा रहे थे !
आचार्यों और देश विदेश के राजाओं के लिए सिंघासन सजाये जा रहे थे ! मार्गों को सुदृढ़ किया जा रहा था ! राम के राज्याभिषेक की तैयारियां युद्ध स्तर पर हो रही थीं और हों भी क्यों न भला ! चक्रवर्त्ती सम्राट राजा दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र का राज्याभिषेक है !
इसे आप अपने घर में ही होने वाले किसी उत्सव की कल्पना करके समझ सकते हैं ! जब हम बिना किसी परिचय के इतना तामझाम जोड़ते हैं तो अयोध्या की तो बात ही क्या !
अयोध्या ,वही अयोध्या जो त्रिलोक विजयी रावण के रहते भी स्वतंत्र थी ! आप समझ सकते हैं अयोध्या क्या थी !
अब इतने बड़े उत्सव की रूपरेखा साकार होने ही लगी थी कि अकस्मात श्री राम का वन गमन और महाराज दशरथ का देहांत दोनों घटनाएँ इतनी आकस्मिक थीं कि किसी को कुछ सोचने समझने का अवसर ही नहीं मिला ! ये कुछ ऐसा था जैसे बारात आने की तैयारी हो और ......
आप समझ सकते हैं !
कहते हैं अयोध्या में श्री राम के जाने के बाद से वापिस लौटने तक मृत्यु के अतिरिक्त कोई संस्कार नहीं हुआ !
उत्सव की तैयारी के लाये गये सभी सामान जहाँ तहां पड़े पड़े कूड़े के ढेर में बदल गये !
लोग बस उनके लौटने की प्रतीक्षा में अपने प्राणों को रखे हुए थे ! इसके लिए सबका अपना तरीका था ! कहीं कोई सामजस्य नहीं था !
भरत जी धरती में गड्ढा खोदकर निवास कर रहे थे तो उर्मिला ने मौन तपस्या को माध्यम बना लिया था ! मांडवी माताओं की सेवा में रत थीं तो शत्रुघ्न और श्रुतकीर्ति ने राज्य और महल की व्यवस्था को बनाये रखने में ही स्वयं को होम कर दिया था !
कल्पना कीजिये जिस देश में चौदह वर्षों से कोई विवाह न हुआ हो कोई जन्म न हुआ हो ! कोई अतिथि न आया हो उस देश ,नगर और घर की हालत क्या हो गयी होगी ! ऐसे में जब हनुमान जी से भरत को राम- रावण के संग्राम की सूचना मिली तो मानों मुर्दों में स्पंदन लौटने लगे ! निराश से पड़े जनजीवन में चेतना लौटने लगी ! हनुमान जी तो चले गये संजीवनी बूटी लेकर लेकिन शत्रुघ्न जी ने अपने गुप्तचर उनके पीछे कर दिए ! वो युद्ध की प्रत्येक सूचना अयोध्या पहुंचा रहे थे ! जिस दिन रावण का वध हुआ ! उस दिन अयोध्या में पहली बार प्रजा का हर्षमिश्रित शोरगुल सुना गया !
अब श्री राम के लौटने की अवधि भी निकट आ रही थी ! लोगों ने पहली बार अपने आस पास दृष्टि डाली तो पता चला ये वो अयोध्या तो न रही जिसमें राम रहते थे ! जिसमें जनकनन्दिनी वधु बनकर आयीं थीं ! पूरा नगर कबाड़ के ढेर में बदल चुका था ! लोगों को स्वयं पर आक्रोश भी आया और ग्लानी भी !
बस फिर तो पूरे नगर को सजाने का वो महोत्सव जो चौदह वर्ष पहले बीच में ही खंडित हो गया था उसे पुन: आरम्भ किया गया !
नगर द्वार देहरियाँ सब सजने लगे !सबसे पहले वो सब सामग्री हटाई गयी जो श्रीराम के अचानक चले जाने से अयोध्या में मातम का संदेश दे रही थी ! फिर रंग रोगन आदि से घरों गलियों को साफ़ सुथरा बनाया गया ! लोगो ने पुरानी वस्तुओं को हटाकर नई नई वस्तुओं की खरीदा ! सूनी पड़ी अयोध्या में हाट बाजार जीवित होकर गुनगुना उठे ! मन्दिरों में घंटे घडियाल बजने लगे !
सरयू के घाट फिर जग पड़े !
जिसे नरकचौदस कहा गया उस दिन लोगों ने अयोध्या की सारी कालिमा को समेटकर सरयू में बहा दिया ! अयोध्या के साथ साथ अयोध्या का सारा जीवन रूपवान होकर चमचमा उठा ! माताओं ने अखंड दीपक जलाये ! और जाप आरम्भ हुए ! वो जानती हैं अब प्रार्थना की ज्यादा जरूरत है !
शायद अति उल्लास से भी डरती हैं कहीं अपनी ही नजर न लग जाये !
दीपावली की काली अंधियारी रात को इतना रोशन और जगमग कर दिया गया है कि विधाता को अपना पत्रा निकालकर निश्चित करना पडा कि आज अमावस्या ही है !
प्रतीक ये भी कि घोर निराशा में भगवान भी तभी आते हैं जब हम स्वागत के लिए उल्लास के दीये जलाये रखें !
अब थोडा आगे !!!!!!!!!!
आज भी यदि कोई यात्रा से लौटता है तो कुछ नियम हैं जिनका पालन सभी करते हैं ! तो राम जब लौटे तो रात्रि में स्वागत की प्रक्रिया ही इतनी लम्बी हो गयी कि पूरी रात्रि बीत गयी ! अगले दिन सबसे पहले श्रीराम को गौशाला में ले जाया गया जहाँ वो गुरुजनों और नगर वासियों के साथ मिलकर गौसंवर्धन का महत्व स्थापित करते हुए प्रभु का आभार प्रकट करते हैं ! आज भी भारतीय जन मानस में गौ को सबसे अधिक पूजनीय माना जाता है ! वो तो स्वयं श्रीराम का युग था ! आज भी जो किसी को एक पैसा न दे कहीं प्रणाम न करे वो भी गौसेवा कर लेता है कभी न कभी !
अब इतने लम्बे वन प्रवास और लौटने के उल्लास में भी एक आवश्यक घटक जो हमारी जीवन रेखा है छूट गया ! लेकिन भगवान श्रीराम को वो याद है ! और वो हैं अयोध्या की बेटियां !
हमारे समाज में पहले बेटियां विवाह के पश्चात जीवन भर मायके नहीं लौटती थी मायके वाले ही समय समय पर उनकी कुचल क्षेम पूछने के लिए जाया करते थे लेकिन चौदह वर्षों से अयोध्या की बेटियां भी तरस गयी हैं अपने भाइयों के दर्शन और कुशलता पाने को !
तब श्री राम ने गुरुजनों की आज्ञा लेकर समस्त राज्य के पुरुषों को ये संदेश भिजवाया कि आज के दिन जो भी भाई अपनी बहन के घर भोजन करेगा उसे यमराज का भी भय न रहेगा ! ये मेरा वचन है !
सब लोग हर्ष मिश्रित क्षमा याचना के साथ अपनी बहनों के घर गये हैं ! बहनें पक्के नारियल से उनकी नजर उतारकर कर उन्हें आशीर्वाद दे रहीं हैं !
क्योंकि इतने वर्षों बाद भाई अचानक आया है तो बहने भी हतप्रभ सी हैं ! क्या खिलाना है कहाँ बैठाना है कुछ समझ ही नहीं पा रही हैं !
ये पंच पर्व इतना साधारण नहीं है जितना दीखता है !
ये सनातन जन मानस का पूरा जीवन चरित्र स्वयं में समेटे हुए है !
समझें और गर्व करें अपनी संस्कृति पर !!!!
सादर नमो नारायण !
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