पर्यावरण प्रदूषण कितने उत्तरदायी हम और हमारा सेक्यूलरिज्म
पिछले वर्ष की ही तरह इस बार भी बेमौसम बरसात ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है |देश के कई हिस्सों में ओलावृष्टि ने कहर बरपाया |आलू की फसल अपनी आँखों के सामने बर्बाद होती देख गौंडा के किसान की सदमे से मौत हो गयी |ऐसी खबरों का सिलसला अभी बस शुरू हुआ है |अब हम लगभग रोज ही इस तरह की खबरें पढ़ेंगे और कभी भगवान और कभी सरकार को कोसेंगे |फिर सरकार से मुआवजे की मांग करेंगे |फिर उस मुआवजे में आरक्षण मांगेंगे और हमारे नेता चीख चीख कर सबको बतायेंगे कि दलित ,पिछड़ा और अल्पसंख्यक सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं |और दोषारोपण का अनवरत सिलसला ..........
क्या यही समाधान है ?क्या इस सब से मौसम अपना व्यवहार सुधार लेगा ?
अभी पिछले दिनों एक और मुद्दा बड़ी सिद्दत से खबरों की सुर्खी बना |खानपान का अधिकार .......
जो शाकाहारी हैं वो मांसाहार विशेष कर गौ मांस के विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे और दूसरा पक्ष जो अपने को हर बार सेक्यूलर दिखाने के चक्कर में राष्ट्रहित की अनदेखी करता है बीफ पार्टी का आयोजन कर रहा था |
कुछ और धर्मगुरु आपस में झगड़ रहे थे ,एक कह रहे थे ये मांसाहार हमारा धार्मिक कर्तव्य है और दूसरे बता रहे थे कि मांसाहार मानवता के लिए खतरा है |कोई किसी की बात सुनने को तैयार नहीं .........
और मौसम इन सब के झगड़े का मानों उपहास उड़ाता हुआ आया और शाकाहारी और मांसाहारी दोनों को रौंद कर चला गया |
जिस प्रकार प्राकृतिक आपदा सबकी साझी होती हैं उसी प्रकार कुछ सामाजिक कर्तव्य भी सबके साझे होते हैं |
जिस समाज के लोग अपने साझे कर्तव्यों को ठीक ढंग से निभाते हैं वो समाज और राष्ट्र हमेशा उन्नति करता है और जिस समाज के लोगों को केवल अधिकार याद रहें और कर्तव्य भूलने की लत लग जाये उस समाज और जाति को नष्ट होने से कोई नहीं रोक सकता |
हम धर्म के नाम पर जनसंख्या बढ़ा रहे हैं जबकि धर्म चाहे कोई भी हो जीवन के लिए स्वच्छ वायु की आवश्यकता सबको होती है जो कि बढ़ते जनसंख्या घनत्व में संभव नहीं है
इसी प्रकार धर्म के नाम पर मासांहार को बढ़ावा दिया जा रहा है |उत्तर प्रदेश में तो इसे लोगों के लिए रोजी रोटी का नाम दे दिया गया है |तो क्या मांसाहारी रोटी खाना छोड़ सकते हैं ?पशु कटान से उत्पन्न सारा रक्त इत्यादि वेस्ट स्वच्छ जल से भरी नदियों में छोड़ा जा रहा है ,तो क्या मांसाहारी लोगों को स्वच्छ जल की आवश्यकता नहीं है |आवास के नाम पर घटती कृषि भूमि क्या केवल शाकाहारियों की ही समस्या है ?
यदि नहीं तो उठिए !और अपनी प्यारी पृथ्वी को बचाने के लिए योगदान करिए !
बंद करो धर्म के नाम पर जनसंख्या बढ़ाना मेरी धरती माँ इतना बोझ नहीं उठा पायेगी
छोड़ो मांसाहार क्योंकि कोई भी माँ अपने बच्चों का रक्त पीकर मर जाएगी
हर रास्ते पर वृक्ष लगाओ ताकि सबके बच्चे स्वच्छ वायु में सांस ले सकें
जब धरती होगी हरी भरी .तभी तो लोग कहेंगे ओततेरी ..........क्या नजारा है
bhut hi achha..ye aaj ki jarurat hai
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