महिला दिवस
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कितना हास्यास्पद लगता है सारे पुरुष महिला दिवस मना रहे हैं .वो भी जिनके घर में महिलाओं को फोन तक रखने का अधिकार नहीं वो व्हाट्स अप पर महिला दिवस मना रहे हैं .महिलाएं भी खुश पुरुष हमारे लिए आवाज उठा रहे हैं .......
और जिनके लिए सचमुच सेलिब्रेशन होना चाहिए वो व्यस्त हैं बल्कि आज सब दिन से ज्यादा व्यस्त हैं .
आज किसी भी कामवाली को छुट्टी नहीं मिली .आफिस में देर तक रुकना पड़ा .और हमारी नारी शक्ति को
आज ज्यादा शक्ति खर्च करनी पड़ी घर आकर .जो रसोई नौ बजे सिमट जाती थी आज दस बजे भी सिमट
जाये तो गनीमत जानो .भाई आखिरकार महिला दिवस है सेलिब्रेशन तो बनता है
आओ सुनाऊं आज तुम्हें मै एक नारी की करुण कथा
सुख पाने की चाह में जिसने दुःख का एक समुद्र मथा
सब भाइयों में छोटी थी पर माँ को लगता बड़ी हुई
छोटी छोटी चाहरदीवारी में दिखती थी खड़ी हुई
राधा सी कोमल थी लेकिन मन में कोई श्याम न था
सुख पाने की चाह में जिसने दुःख का एक समुद्र मथा
जिस आंगन में खेलकूद कर बचपन से अपना माना
उस आंगन ने उस बाबुल ने छपवाया एक परवाना
अब बेटी अपने घर जाओ ,ये आंगन तेरा न था
सुख पाने की चाह में जिसने दुःख का एक समुद्र मथा
नये नगर में नये लोग थे ,नयी नयी चतुराई थी
उस घर में सब घर वाले थे वो ही एक पराई थी
अजनबियों के उस मेले में कोई भी अपना न था
सुख पाने की चाह में जिसने दुःख का एक समुद्र मथा
माँ कहती वो तेरा घर है ,सास कहे ये मेरा घर
तेरे मेरे के झगड़े में बीत गयी अनमोल उमर
जीवन संध्या की बेला थी लेकिन अपना घर न था
सुख पाने की चाह में जिसने दुःख का एक समुद्र मथा
सुख पाने की चाह में जिसने दुःख का एक समुद्र मथा
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