Thursday, March 10, 2016

||जय जय श्रीकृष्णा ||
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अंतहीन सिलसिला हमारी मूर्खताओं का ...........
और मेरे प्रभु का कैसा अटल स्वभाव बार बार क्षमा करने का ....
न हम सुधरने को तैयार और न वो हमें छोड़ने को .बस समझाते हैं 
वो भी एकांत में बिलकुल माँ की तरह ...
देखो तुम मेरे हो और तुम्हारे हर आचरण से मैं जुडा हूँ इसलिए ऐसा कोई काम
ना करना जो उचित न हो तुम अनुचित करोगे लोग मुझे कहेंगे .....
क्या ये सब तुम्हें अच्छा लगेगा ?
हम भी बड़े गंभीर होकर हाँ में हाँ मिलाते हुए संत सज्जन होने का भ्रम बनाते हैं
और वो बस मुस्कराते हैं |और हम अगली बार अवसर मिलते ही अपना रंग दिखा देते हैं|
अभी कोई मित्र चले आए उन्हें कुछ सामान की जरूरत थी हमने अपने बेटे के हाथ
भिजवा दिया |जब बेटे ने कहा मैंने दे दिया तो हमारा अहंकार बोला मेरेपैसे थे तूने क्या दिया
और वो फिर एकांत में ले जाकर धीरे से बोले तुम कहाँ से लायी थी ?
जब लिए मैंने, वापस करूंगा मैं ,किसी और को आवश्यकता थी तो उसको दे दिए
ये क्या बात बात में सबकी टोकरी अपने सिर पर उठा लेती हो ..........
जब एक बार कह दिया कि मैं हूँ ना तो विश्वास क्यों नहीं करती .
अब उन्हें कैसे बताऊं कि आदत से मजबूर हूँ
उनकी गोद में बैठकरभी अपनी करम गठरिया छोड़ने को तैयार नहीं
बड़ा मजबूत संस्कार है आसानी से नहीं छुटेगा
पर इतना भी विश्वास है कि वो कदम कदम पर दृष्टि रखे हुए हैं .एक न एक दिन अवश्य ही सुधार देंगे .क्योंकि हमारी गलती उनका नाम खराब करती है
श्री हरि
‪#‎जीवनअनुभव‬
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