Tuesday, March 15, 2016

||श्री हरि||
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कितने दिन गुजर गये ,जब भी मन उदास होता है तो मन में बस एक ही विचार आता है काश आज माँ होती| और ये जानकर कि माँ अब कहीं नहीं है दिल फिर
निराश होने लगता है |अक्सर कुछ ऐसा ही भाव ईश्वर के लिए भी होता है |कभी 
कभी दिल छोटे बच्चे की तरह हुमकता हैं कि बस उन्हीं के साथ रहना है बदले में 
कुछ नहीं चाहिए |माँ भी नहीं .............
और आज ये दिल फिर उसी जिद पर आ गया है |जानते हैं क्यों ?........
कल बड़े वर्षों बाद हमारे एक भाई मिले |हमें देखकर बोले तुम्हें देखकर चाची
(हमारी माँ )की याद आ गयी |मतलब हम धीरे धीरे अपनी माँ में बदल रहे हैं|
तो चलो आज से शीशे के सामने खड़े होकर माँ से मिल लिया करेंगे |
और तभी से मन में बार बार यही इच्छा हो रही है काश कोई हमसे मिलकर कहे
तुम्हें देखकर ठाकुर जी (हमारे भाई)की याद आ गयी |कितना आनंदमय अनुभव हो हमें ठाकुर जी से मिलने की इच्छा हो और हम जाकर दर्पण के सामने बैठ जाएँ |और फिर खूब दर्शन हों न उन्हें आने जाने का झंझट ना हमें उनके बिछड़ने का कोई डर ..............................
श्री हरि ......जय जय श्री राधे

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