Thursday, March 17, 2016

||जय श्री कृष्णा ||
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मुझे मिल गया ...
एक इंजीनियर था |उसे विभिन्न आकार प्रकार के भवन बनाने का बड़ा ही शौक़ था |वो जब भी कोई भवन बनाता तो भवन में एक कक्ष अपने लिए जरुर बनाता था |और नया भवन बनने के बाद उसी में रहता था |एक बार उसने भवन बनाना शुरू किया तो निर्माणाधीन भवन में ही एक सेवक की नियुक्ति कर दी अब भवन निर्माण से लेकर रखरखाव तक की सभी जिम्मेदारी उस सेवक को सौंप कर वो उसी भवन के एक कोने में बैठ गया |अब भवन जब बनकर तैयार होने ही वाला था कि एक दिन सेवक को बुला कर कहा जब भवन बनकर तैयार हो जायेगा तो लोग भवन को देखने आयेंगे |तब तुम ही उनसे मिलना मैं यहीं हूँ इसी भवन के एक कक्ष में |तुम्हें जब भी कोई आवश्यकता हो मुझे बताना |तुम्हें बस इतना करना है कि जब अपने लिए भोजन बनाओ तो मेरे लिए भी बनाना और कोई निर्णय करो तो मुझसे सलाह कर लेना |बाकी तुम जानो ............
इसके लिए मेरा नम्बर संभाल कर रखो .जब चाहो इंटरकॉम पर संपर्क करसकते हो |ये कहकर वो इंजीनियर भवन के भीतर प्रवेश कर गया |भवन का उद्घाटन हुआ लोग देखने आते उस सेवक से बात करते ,शुरू शुरू में सेवक को जो भी आवश्यकता होती |वो उपलब्ध हो जाता और सेवक उस में संतुष्ट हो जाता |फिर धीरे धीरे भवन के रखरखाव के लिए जरूरतें बढने लगीं |उसने मालिक से कहा मालिक ने उसे कुछ सहायक उपलब्ध करा दिए |
वो प्रधान सेवक बड़ा खुश हुआ अब सहायको से काम करवाता और स्वयं बैठकर भवन पर
कब्जा करने के मंसूबे बनाता |धीरे धीरे उसने मालिक से पूछना भी छोड़ दिया |उसे अपने मालिक होने का इतना विश्वास हो गया कि वो अंदर किसी कक्ष में मौजूद असली मालिक को भी भूल गया |मालिक भी उसे व्यस्त देखकर कुछ उदास रहने लगा |अब सेवक उससे
बिलकुल बात नहीं करता था |यहाँ तक कि उससे कुछ मांगता भी नहीं था |पर इंजीनियर
को अभी भी याद था कि भवन मेरा है सो भवन में रहने वालों का भार भी मुझ पर है सो सेवक के बिना मांगे भी वो आवश्यक प्रबंध करता रहा |इसी तरह बहुत सा समय बीत गया सेवक अपनी धुन में ऐसा खोया कि पहले खुद को भूला फिर मालिक को भूला और फिर वो इंटरकॉम पर सम्पर्क करने का माध्यम (नम्बर)भी भूल गया |मालिक इस भवन की जरूरी व्यवस्था करके दूसरे भवन निर्माण में व्यस्त हो गया |लेकिन अनाप शनाप खर्च और बिना सोचे निर्णय करने के कारण इस भवन का सारा खजाना खाली हो गया |आवश्यक खर्च के अभाव में उसके सहायकों ने भी साथ छोड़ना आरम्भ कर दिया |अब तो वो प्रधान सेवक बड़ा दुखी हुआ |फिर उसे किसी और भवन का सेवक मिला |जब उसने पहले सेवक की पीड़ा सुनी तो अपने मालिक से बताने का सुझाव दिया |अब तो वह और दुखी हो गया क्योंकि सम्पर्क सूत्र तो जाने कहाँ खो गया था |तब उसने विचार किया भवन के अंदर जाकर देखूं ?वह अंदर गया फिर मालिक को न पाकर निराश होकर बाहर आ गया उसके बाहर आते ही भवन नष्ट हो गया |तब से आज तक वो सेवक अपने मालिक से मिलने के लिए हर नये भवन में जाता है और कुछ दिन वहाँ रहता है |भवन में उपलब्ध सामग्री का उपभोग करता है समाप्ति पर मालिक को ढूंढता है और न मिलने पर बाहर आकर फिर किसी नये भवन में प्रवेश कर जाता है |युगों युगों से ये सिलसला यूँ ही चल रहा है |अबकी बार उसने सोचा है कि इस बार बस मालिक को खोजूंगा और भवन में उपलब्ध भोग सामग्री का बस जरूरत भर उपयोग करूंगा |भवन में ज्यादा सामान होगा तो उसे बाहर निकाल दूंगा |हो सकता है साफ सफाई करते वक्त वो सम्पर्क सूत्र मिल जाये ?
ईश्वर से प्रार्थना है कि इस बार उसकी मदद करें |
संतो का ही कथन है कि ...............
क्षमा बडन को चाहिए ,छोटन को अपराध
श्री हरि |
‪#‎जीवनअनुभव‬
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