Monday, September 11, 2017

मूसा एक जंगल से गुजरते थे और उन्होंने एक आदमी को झुके देखा। साँझ हो गयी थी, सूर्यास्त हो रहा था। वह आदमी गड़रिया था। उसकी भेड़ें भी उसीके पास— पास में—में करती घूम रही थीं और वह उन्हींके बीच में बैठा प्रार्थना में लीन था। आकाश की तरफ हाथ जोड़े हुए थे उसने और बड़ी मस्ती में बातें कर रहा था। मूसा भी ठिठक गये उसके पीछे कि क्या कह रहा है? जो सुना तो मूसा बहुत घबडा गये। यह कोई प्रार्थना है!

वह आदमी कह रहा था कि हे प्रभु, तू बहुत अकेला होगा वहाँ! मुझे पता है कभी—कभी जब रात अकेले होता हूँ, कैसा भय लगता है। तुझे भय नहीं लगता? तुझे भय लगता होगा, मैं आने को राजी हूँ, तू मुझे बुला ले। मैं सदा तेरे साथ रहूँगा, तेरी छाया बन जाऊँगा। और कभी—कभी तु्झे भूख भी लगती होगी और कोई भोजन देनेवाला नहीं होता होगा। मैं तेरा भोजन भी बना दूँगा, मुझे भोजन बनाना भी आता है। और मैं तुझे खूब नहलाऊँगा, धुलाऊँगा पता नहीं किसीने तुझे नहलाया—धुंलाया कि नहीं; जूँ पड़ गयी होंगी——मेरी भेड़ों में पड़ जाती हैं। मगर देख लो मेरी भेड़ों को, एक—एक की सफाई कर देता हूं। रात तेरे पैर भी दबा दूँगा, थक जाता होगा ——इतना विराट तेरा विस्तार है, इसका निरीक्षण करते—करते थक जाता होगा, रात तेरे पैर भी दबा दूँगा। तेरे कपड़े भी धो दूँगा। तू जो कहेगा सब कर दूँगा, तू मुझे उठा ले, तू मुझे बुला ले।

मूसा के बर्दाश्त के बाहर हो गया जब उसने कहा तेरी जूँ भी बीन दूँगा। मूसा ने कहा——ठहर नासमझ! यह प्रार्थना कैसी प्रार्थना? बहुत प्रार्थनाएँ मैने सुनी, यह तूने किससे सीखी, कहाँ से सीखी? वह तो घबड़ा गया, सीधा—सादा आदमी, उसने कहां——मुझे क्षमा करो, मुझे कुछ पता नहीं, सीखी नहीं, खुद ही बना ली है। यह तो आप जानते ही हैं कि मैं तो गड़रिया हूँ, पढ़ा—लिखा नहीं हूँ, शास्त्र की मुझे क्या तमीज, संस्कार जैसी चीज मुझपर कोई पड़ी नहीं है, खुद ही बना ली है। अब भेड़ों से बात करता हूँ, उतनी ही मेरी भाषा है। उसी भाषा को परिमार्जित करके परमात्मा से बात कर लेता हूं। आप मुझे सिखा दें। तो मूसा ने ठीक—ठीक यहूदियों की जो प्रार्थना है, वह सिखायी। बड़े प्रसन्न थे मूसा कि एक भटके हुए आदमी को रास्ते पर लाए।

और जब उस आदमी को छोड़ कर मूसा चले, तो जैसे ही एकांत आया, जोर से एक आवाज आकाश से गूँजी कि मूसा, मैंने तुझे भेजा था कि तू लोगों को मेरे पास लाना, तू तो लोगों को मुझसे दूर करने लगा। मेरा प्यारा, तूने उससे उसकी प्रार्थना छीन ली! शब्द नहीं सुने जाते हैं, भाव सुने जाते हैं। तू वापिस जा, क्षमा माँग! उससे प्रार्थना सीख! मूसा तो कांप गये। भागे— गये, उस गड़रिये को पकड़ा, उसके चरणों में गिरे और कहा—मुझे क्षमा कर दे, भाई! मैने जो कहा उसे वापिस लेता हूँ। परमात्मा की नजरों में तेरी प्रार्थना स्वीकार हो गयी है, हमारी प्रार्थना अभी स्वीकार नहीं हुई है। तू जैसा चाहे वैसा ही कर। और मुझे क्षमा कर दे। मुझसे बड़ी भूल हो गयी।
यह कहानी मधुर है, प्रीतिकर है, अनूठी है। सहज, स्वाभाविक, तब पूजा का अनुभव होता है। अभी तो तुम्हारी पूजा इतनी ओछी है!

संतो मगन भया मन मेरा–(प्रवचन–14)

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