छत पर पतंग आ गिरी है !कुछ अजनबी बच्चे उस पतंग के पीछे दौड़ते हुए गली तक आ
गये हैं ! निगाहें पतंग के साथ साथ आसमान की ओर उठी हैं !और एक घर के
दरवाजे पर आकर दौड़ थमी है ! क्योंकि पतंग उसी घर की छत पर जाकर गुम हो गयी
है ! कैसे जाएँ छत तक ! सीढियाँ सामने हैं लेकिन गृह स्वामिनी दरवाजे पर ही
बैठी हैं ! एक छोटा बच्चा कहता है ! आंटी हमारी पतंग आपकी छत पर चली गयी !
आंटी मौन है ! बच्चा फिर पूछता है !ले आयें क्या ? और आंटी शरारती बच्चे
की तरह गर्दन हिला देती हैं ना की मुद्रा में ! लेकिन बच्चों
की दृष्टि ताड़ गयी है प्रेम की निश्छलता को ! वो गये नहीं हैं खड़े हैं !
सबकी नजर छत पर है और आंटी की नजर बच्चों पर ! और जैसे ही एक सांवले से
बच्चे से आंटी की नजर टकराई दोनों ही मुस्कुरा पड़े !और मानों संकेत हो गया
मित्रता का !
बच्चा आगे बढ़ कर पूछता है ! ले लें आंटी !आपके किस काम की ! मानों जाते जाते याद दिलाता है कि आप अब बच्ची नहीं रहीं ........
आंटी मुस्कुराते हुए छत की ओर इशारा कर देती हैं ! मानों इतनी सी चंचलता ही पर्याप्त है और साथ ही धन्यवाद भी ! बचपन से बचपन को मिलाने के लिए !
जब आप प्रेम पूर्ण होते हैं ,सहज होते हैं तो समस्त अस्तित्व प्रेम पूर्ण और सहज होता है ! आपको किसी से कहना न पड़ेगा कि हम प्रेम पूर्ण हैं आपकी दृष्टि जिस तरफ उठेगी आप देखेंगे कि उस ही दिशा से प्रेम का सूर्य आपको प्रकाशित करने को तत्पर है ! प्रेम को शब्दों की आवश्यकता नहीं है ! शब्द निरर्थक हैं ! कभी आप ठीक से कह न पाए ,कभी हम ठीक से समझ न पायें ! हम कुछ और सुनना चाहते थे आपने कुछ और कह दिया ! हो गयी गड़बड़ !
लेकिन मौन वही कहता है जो आप कहना चाहते हैं और लोग वही समझते हैं जो वो समझना चाहते थे !
वैसे होता तो शब्दों में भी यही है ! आप अपने भाव में कहें लोग अपने भाव में समझेंगे !!!!!!! मौन में फिर भी कुछ संभावना बचती है कि अर्थ का अनर्थ न हो !
चेहरे की मुस्कान सामने वाले को प्रेरित करती है कि आप जो कहेंगे सकारात्मक ही होगा इसलिए एक प्रेमपूर्ण दृष्टि के उठने भर से बहुत सी जटिलताएं कम हो जाती है !
बच्चा आगे बढ़ कर पूछता है ! ले लें आंटी !आपके किस काम की ! मानों जाते जाते याद दिलाता है कि आप अब बच्ची नहीं रहीं ........
आंटी मुस्कुराते हुए छत की ओर इशारा कर देती हैं ! मानों इतनी सी चंचलता ही पर्याप्त है और साथ ही धन्यवाद भी ! बचपन से बचपन को मिलाने के लिए !
जब आप प्रेम पूर्ण होते हैं ,सहज होते हैं तो समस्त अस्तित्व प्रेम पूर्ण और सहज होता है ! आपको किसी से कहना न पड़ेगा कि हम प्रेम पूर्ण हैं आपकी दृष्टि जिस तरफ उठेगी आप देखेंगे कि उस ही दिशा से प्रेम का सूर्य आपको प्रकाशित करने को तत्पर है ! प्रेम को शब्दों की आवश्यकता नहीं है ! शब्द निरर्थक हैं ! कभी आप ठीक से कह न पाए ,कभी हम ठीक से समझ न पायें ! हम कुछ और सुनना चाहते थे आपने कुछ और कह दिया ! हो गयी गड़बड़ !
लेकिन मौन वही कहता है जो आप कहना चाहते हैं और लोग वही समझते हैं जो वो समझना चाहते थे !
वैसे होता तो शब्दों में भी यही है ! आप अपने भाव में कहें लोग अपने भाव में समझेंगे !!!!!!! मौन में फिर भी कुछ संभावना बचती है कि अर्थ का अनर्थ न हो !
चेहरे की मुस्कान सामने वाले को प्रेरित करती है कि आप जो कहेंगे सकारात्मक ही होगा इसलिए एक प्रेमपूर्ण दृष्टि के उठने भर से बहुत सी जटिलताएं कम हो जाती है !
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