पर उपदेश कुशल बहुतेरे ! जे आचरहिं ते नर न घनेरे !
कुछ विद्वानों की सभा में एक समसामयिक प्रश्न रखा था हमने !कि वर्तमान समय में श्राद्ध कर्म की विधि में क्या कुछ परिवर्तन किये जा सकते हैं ? ग्रुप था --प्रश्नोत्तर -आपके प्रश्न सबके उत्तर !!
पहले कुछ टिप्पणियों को देंखें ..........
वो जिन्होंने प्रश्न समझा और एक जैसी ही परस्थिति का सामना कर रहे हैं -----
#नरेंद्रसिंह चौहान . बहुत बहुत .. बहुत ही अपेक्षित प्रश्न । आवश्यक है ये ।
हम #सविता गोयल ....
आज अधिकांश लोग नौकरी पेशा हैं ! जो नौकरी नहीं कर रहे हैं उन घरों के बच्चे स्कूल कालेज आदि जाते हैं ! महिलाएं भी कामकाजी हैं ! ब्राह्मण अपने जातकर्म व्यवहारों में लज्जा का अनुभव कर रहे हैं ! 60 -70 %ब्राह्मणों में जनेऊ विवाह के समय धारण कराया जा रहा है ! और वो भी परम्परा के लिए ही ! उन्हें जनेऊ की मान्यता और नियम का कोई ज्ञान ही नहीं कराया जा रहा है ! और एकादशी महात्म्य में हमने पढ़ा है कि परमात्मा और पितरों के निमित्त कुछ भी दान आदि पात्र व्यक्ति को ही दें ! अपात्र को दिया गया दान विपरीत फल देता है ! ऐसे में शास्त्रीय विधि से श्राद्ध होना काफी जटिल क्या असम्भव सा हो गया है ! इसलिए वर्तमान परिपेक्ष्य में सुधार अपरिहार्य आवश्यकता बन गयी है !
#कुलभूषण सिंघल जी ..
बहुत सुंदर प्रश्न है, बदलाव तो हो रहा है । मेरे विचार से हर व्यक्ति को अपना सकारात्मक अनुभव बताना चाहिये
आदरणीय #उर्मिला लाम्बा जी..
हमारे यहाँ भी ये समस्या है. मंदिर में भी सब देते हैं तो वहाँ भी बहुतायत के कारण वेस्टेज ही जाता है. पितरों के निमित्त श्रद्धा से निकाला हुआ भोजन आप गरीबों को खिलाईये. उनके भूखे बड़े बूढ़े, बच्चे सब तृप्त होंगे तो परमात्मा भी प्रसन्न होगा.
आदरणीय #वैभव कुमार ---
कौन करेगा?
कौन मानेगा? कही स्थानों पर तो कौआ नहीं मिलता आप फिर भी ब्राह्मण के शोध में है
😂

आदरणीय #ओम शुक्ल जी ...
तो,क्या राजघाट पर और शान्तिवन हर साल होनेवाली शोक सभायें बन्द हो जायेंगी,नहीं ना.?
यह सब भ्रम डाला जा रहा है,चर्च में आज भी शोक सभायें होतीं है,मस्जिद में आत्म शान्ति के लिए फातया आज भी पढा जाता है,किन्तु हमारी संस्कृति शोक में भी कहती है,लोगों पर परोपकार करो,भुकों को भोजन करावो,और जिस भावना के साथ परोपकार करो,वह उसी रुप में फलीभूत होता है,हां थोड़ा श्राद्धपक्ष को और अधिक अच्छे से समझने की जरुरत है,श्राद्धपक्ष में भूखे लोगों को भोजन करवावें !
आदरणीय #ओमप्रकाश भट्ट जी --
व्यवस्था शास्त्र में ही है। किसी गाय को केवल उसी समय काट कर घास खिलाएं यदि इतना भी नहीं होसकता तो अपने दोनों हाथों को हम खड़ा कर अपने पितरों से क्षमा याचना कर दें। अब इससे ज्यादा क्या कर सकते हैं।
आदरणीय #सुधांशु शुक्ल जी --
मेरा मत है कि यदि आप समर्थ है सब करने को...और कोई योग्य ब्राह्मण न मिले तो संभावित ब्राह्मणो मे जो अपेक्षाकृत श्रेष्ठ हो उसे भोजन दक्षिणादि करें.... भूखे बुजुर्गों को भी खिलाईए...उन्हें रोज खिलाईए....दान करिए...परंतु श्राद्ध में ब्राह्मणों को भी दानादि किजिए.....
आदरणीय #राजेन्द्र प्रसाद शर्मा जी ...
श्राद्ध श्रद्धा का विस्तारित स्वरूप तो है ही। श्राद्ध विधा से जुडा एक विज्ञान भी है। इस क्षेत्र के स्कौलर्स का कर्तव्य व दायित्व है। हमारे जैसे लोगों का सहयोग उन्हें मिलेगा। गायत्रीपरिवार का साहित्य, कल्याण का परलोक व पुनर्जन्म अंक एवं मृत्युविज्ञान, धर्मनिर्णय, निर्णयसिन्धु एवं मृत्युविषयक साहित्य के आधार पर श्राद्धकर्म को समाचीन स्वरुप बडी आसानी से किया जा सकता है। यह दायित्व एक टीम द्वारा होना चाहिये, जिसके ऊपर एक निर्णायक मंडल हो जो इसे अंतिम रूप दे।
प्रश्न यह है कि इसे कराये कोंन ?
मेरे विचार में यह दायित्व हमारे शंकराचार्यों द्वारा किया जाना चाहिए।
सादर।।
आदरणीय #स्वामी राघवेन्द्रदास स्वर्गाश्रम --
श्रीराम! कुछ न कुछ परिवर्तन ,जिसंसे कि मूल स्वरूप और उद्देश्य भी बना रहे, ,कर लेना चाहिए।।
किन्तु कब कितना परिवर्तन करना है, यह विवेक बड़ा कठिन है।
फिर कुछ वो जो पूरे समाज को डराते हैं शास्त्रों का भय दिखाकर !
भगवान श्रीराम ने गयाजी में अपने पितरों का पिंड दान कर श्राद्ध किया था यह आस्था से एवं अपनी जीवनी की जड़ की परंपरा से जुड़ा है इसमें बदलाव हमारे हिसाब से ठीक नहीं है इस से तो बेहतर है वह इसे ना करें और पश्चिमी देश की संस्कृति को अपना जय जय श्री कृष्णा..
कई ब्राह्मण मित्र जो शास्त्रों के ठेकेदार से लगते हैं ! स्वयं पर आते ही व्यक्तिगत प्रश्न बताकर भडक उठे !
एक ने तो स्त्री से विवाद को साक्षात् मृत्यु का लक्षण कह डाला !हमने अपना समाधान जो निजी अनुभव पर आधारित था दिया !
सब पिसे हुए को पीस रहे हैं लिख लिखाया परोस रहे हैं ! थोडा कटु लग सकता है लेकिन सत्य यही है कि शास्त्रों की कुछ बातें बदलते परिपेक्ष्य में अप्रसांगिक होने लगी हैं ! ब्राह्मणों ने इसका कोई समाधान नहीं ढूंढा क्योंकि समाज में प्रचलित प्रथाओं को बदलना दीवारों सहित मकान की जमीन बदलने से भी अधिक चुनौतीपूर्ण कार्य होता है !
हमारा कोई लालच नहीं ! न यजमान के रुष्ट होने का न परिवार के रुष्ट होने का ! वर्तमान परिपेक्ष्य में हमने जो रास्ता निकाला है उसे यहाँ रख रहे हैं ! जिससे परम्पराएँ भी बची रहें ! बच्चों को कम से कम अपने चार पीढ़ी के पूर्वजों के नाम अवश्य याद भी रहें और उनको अपनी परम्पराओं पर गर्व भी रहे !
हम पिछले चार सालो से श्राद्ध को परम्परा गत तरीके से नहीं करते ! बल्कि पूरे चौदह दिनों तक करते ही नहीं ! इसके बाद पितृविसर्जिनी अमावस्या को पन्द्रह दिन का राशन मंगवाते हैं ! रसोई का लगभग सभी सामान होता है ! जैसे हल्दी मिर्च जीरा नमक धनिया रिफाइंड तेल सरसों का तेल .देशी घी ,चीनी ,चावल दाल आटा दूध का पैकिट . लगभग सभी तरह की कच्ची सब्जियां ! कुछ वस्त्र और दक्षिणा ! ये सब सामन एक बड़े बर्तन में रखते हैं और जल हाथ में लेकर अपने सभी दिवंगत पूर्वजों को याद करके संकल्प छोड़ देते हैं ! ये कार्य हमारा बेटा करता है ! उस दिन छुट्टी हो न हो वो अपने आफिस से छुट्टी लेता है नारायण !
पिछले चार सालो में हम बहुत ही आनंद पूर्वक ये कर रहे हैं और कहीं कोई परेशानी नहीं है नारायण !
तो तुरंत ही फिर एक पंडित जी जो स्वयं ब्राह्मण वृति छोड़ चुके हैं ! आ गये होठ बिचकाने !!
इसे आमान्य श्राद्ध कहते हैं सविता जी। लेकिन ये विकल्प ही है। जिसमें श्राद्धान्न निकाल कर सकल्प पूर्वक किसी ब्राह्मण को दे दिया जाता है।
तो सज्जनों मतलब स्पष्ट है कि ब्राह्मण चाहे जो करे लेकिन बाकी समाज को शास्त्र की वही व्याख्या मंजूर होनी चाहिए जो ये पंडित कहें !!इति वार्ता:
नमो नारायण !!
कुछ विद्वानों की सभा में एक समसामयिक प्रश्न रखा था हमने !कि वर्तमान समय में श्राद्ध कर्म की विधि में क्या कुछ परिवर्तन किये जा सकते हैं ? ग्रुप था --प्रश्नोत्तर -आपके प्रश्न सबके उत्तर !!
पहले कुछ टिप्पणियों को देंखें ..........
वो जिन्होंने प्रश्न समझा और एक जैसी ही परस्थिति का सामना कर रहे हैं -----
#नरेंद्रसिंह चौहान . बहुत बहुत .. बहुत ही अपेक्षित प्रश्न । आवश्यक है ये ।
हम #सविता गोयल ....
आज अधिकांश लोग नौकरी पेशा हैं ! जो नौकरी नहीं कर रहे हैं उन घरों के बच्चे स्कूल कालेज आदि जाते हैं ! महिलाएं भी कामकाजी हैं ! ब्राह्मण अपने जातकर्म व्यवहारों में लज्जा का अनुभव कर रहे हैं ! 60 -70 %ब्राह्मणों में जनेऊ विवाह के समय धारण कराया जा रहा है ! और वो भी परम्परा के लिए ही ! उन्हें जनेऊ की मान्यता और नियम का कोई ज्ञान ही नहीं कराया जा रहा है ! और एकादशी महात्म्य में हमने पढ़ा है कि परमात्मा और पितरों के निमित्त कुछ भी दान आदि पात्र व्यक्ति को ही दें ! अपात्र को दिया गया दान विपरीत फल देता है ! ऐसे में शास्त्रीय विधि से श्राद्ध होना काफी जटिल क्या असम्भव सा हो गया है ! इसलिए वर्तमान परिपेक्ष्य में सुधार अपरिहार्य आवश्यकता बन गयी है !
#कुलभूषण सिंघल जी ..
बहुत सुंदर प्रश्न है, बदलाव तो हो रहा है । मेरे विचार से हर व्यक्ति को अपना सकारात्मक अनुभव बताना चाहिये
आदरणीय #उर्मिला लाम्बा जी..
हमारे यहाँ भी ये समस्या है. मंदिर में भी सब देते हैं तो वहाँ भी बहुतायत के कारण वेस्टेज ही जाता है. पितरों के निमित्त श्रद्धा से निकाला हुआ भोजन आप गरीबों को खिलाईये. उनके भूखे बड़े बूढ़े, बच्चे सब तृप्त होंगे तो परमात्मा भी प्रसन्न होगा.
आदरणीय #वैभव कुमार ---
कौन करेगा?
कौन मानेगा? कही स्थानों पर तो कौआ नहीं मिलता आप फिर भी ब्राह्मण के शोध में है
आदरणीय #ओम शुक्ल जी ...
तो,क्या राजघाट पर और शान्तिवन हर साल होनेवाली शोक सभायें बन्द हो जायेंगी,नहीं ना.?
यह सब भ्रम डाला जा रहा है,चर्च में आज भी शोक सभायें होतीं है,मस्जिद में आत्म शान्ति के लिए फातया आज भी पढा जाता है,किन्तु हमारी संस्कृति शोक में भी कहती है,लोगों पर परोपकार करो,भुकों को भोजन करावो,और जिस भावना के साथ परोपकार करो,वह उसी रुप में फलीभूत होता है,हां थोड़ा श्राद्धपक्ष को और अधिक अच्छे से समझने की जरुरत है,श्राद्धपक्ष में भूखे लोगों को भोजन करवावें !
आदरणीय #ओमप्रकाश भट्ट जी --
व्यवस्था शास्त्र में ही है। किसी गाय को केवल उसी समय काट कर घास खिलाएं यदि इतना भी नहीं होसकता तो अपने दोनों हाथों को हम खड़ा कर अपने पितरों से क्षमा याचना कर दें। अब इससे ज्यादा क्या कर सकते हैं।
आदरणीय #सुधांशु शुक्ल जी --
मेरा मत है कि यदि आप समर्थ है सब करने को...और कोई योग्य ब्राह्मण न मिले तो संभावित ब्राह्मणो मे जो अपेक्षाकृत श्रेष्ठ हो उसे भोजन दक्षिणादि करें.... भूखे बुजुर्गों को भी खिलाईए...उन्हें रोज खिलाईए....दान करिए...परंतु श्राद्ध में ब्राह्मणों को भी दानादि किजिए.....
आदरणीय #राजेन्द्र प्रसाद शर्मा जी ...
श्राद्ध श्रद्धा का विस्तारित स्वरूप तो है ही। श्राद्ध विधा से जुडा एक विज्ञान भी है। इस क्षेत्र के स्कौलर्स का कर्तव्य व दायित्व है। हमारे जैसे लोगों का सहयोग उन्हें मिलेगा। गायत्रीपरिवार का साहित्य, कल्याण का परलोक व पुनर्जन्म अंक एवं मृत्युविज्ञान, धर्मनिर्णय, निर्णयसिन्धु एवं मृत्युविषयक साहित्य के आधार पर श्राद्धकर्म को समाचीन स्वरुप बडी आसानी से किया जा सकता है। यह दायित्व एक टीम द्वारा होना चाहिये, जिसके ऊपर एक निर्णायक मंडल हो जो इसे अंतिम रूप दे।
प्रश्न यह है कि इसे कराये कोंन ?
मेरे विचार में यह दायित्व हमारे शंकराचार्यों द्वारा किया जाना चाहिए।
सादर।।
आदरणीय #स्वामी राघवेन्द्रदास स्वर्गाश्रम --
श्रीराम! कुछ न कुछ परिवर्तन ,जिसंसे कि मूल स्वरूप और उद्देश्य भी बना रहे, ,कर लेना चाहिए।।
किन्तु कब कितना परिवर्तन करना है, यह विवेक बड़ा कठिन है।
फिर कुछ वो जो पूरे समाज को डराते हैं शास्त्रों का भय दिखाकर !
भगवान श्रीराम ने गयाजी में अपने पितरों का पिंड दान कर श्राद्ध किया था यह आस्था से एवं अपनी जीवनी की जड़ की परंपरा से जुड़ा है इसमें बदलाव हमारे हिसाब से ठीक नहीं है इस से तो बेहतर है वह इसे ना करें और पश्चिमी देश की संस्कृति को अपना जय जय श्री कृष्णा..
कई ब्राह्मण मित्र जो शास्त्रों के ठेकेदार से लगते हैं ! स्वयं पर आते ही व्यक्तिगत प्रश्न बताकर भडक उठे !
एक ने तो स्त्री से विवाद को साक्षात् मृत्यु का लक्षण कह डाला !हमने अपना समाधान जो निजी अनुभव पर आधारित था दिया !
सब पिसे हुए को पीस रहे हैं लिख लिखाया परोस रहे हैं ! थोडा कटु लग सकता है लेकिन सत्य यही है कि शास्त्रों की कुछ बातें बदलते परिपेक्ष्य में अप्रसांगिक होने लगी हैं ! ब्राह्मणों ने इसका कोई समाधान नहीं ढूंढा क्योंकि समाज में प्रचलित प्रथाओं को बदलना दीवारों सहित मकान की जमीन बदलने से भी अधिक चुनौतीपूर्ण कार्य होता है !
हमारा कोई लालच नहीं ! न यजमान के रुष्ट होने का न परिवार के रुष्ट होने का ! वर्तमान परिपेक्ष्य में हमने जो रास्ता निकाला है उसे यहाँ रख रहे हैं ! जिससे परम्पराएँ भी बची रहें ! बच्चों को कम से कम अपने चार पीढ़ी के पूर्वजों के नाम अवश्य याद भी रहें और उनको अपनी परम्पराओं पर गर्व भी रहे !
हम पिछले चार सालो से श्राद्ध को परम्परा गत तरीके से नहीं करते ! बल्कि पूरे चौदह दिनों तक करते ही नहीं ! इसके बाद पितृविसर्जिनी अमावस्या को पन्द्रह दिन का राशन मंगवाते हैं ! रसोई का लगभग सभी सामान होता है ! जैसे हल्दी मिर्च जीरा नमक धनिया रिफाइंड तेल सरसों का तेल .देशी घी ,चीनी ,चावल दाल आटा दूध का पैकिट . लगभग सभी तरह की कच्ची सब्जियां ! कुछ वस्त्र और दक्षिणा ! ये सब सामन एक बड़े बर्तन में रखते हैं और जल हाथ में लेकर अपने सभी दिवंगत पूर्वजों को याद करके संकल्प छोड़ देते हैं ! ये कार्य हमारा बेटा करता है ! उस दिन छुट्टी हो न हो वो अपने आफिस से छुट्टी लेता है नारायण !
पिछले चार सालो में हम बहुत ही आनंद पूर्वक ये कर रहे हैं और कहीं कोई परेशानी नहीं है नारायण !
तो तुरंत ही फिर एक पंडित जी जो स्वयं ब्राह्मण वृति छोड़ चुके हैं ! आ गये होठ बिचकाने !!
इसे आमान्य श्राद्ध कहते हैं सविता जी। लेकिन ये विकल्प ही है। जिसमें श्राद्धान्न निकाल कर सकल्प पूर्वक किसी ब्राह्मण को दे दिया जाता है।
तो सज्जनों मतलब स्पष्ट है कि ब्राह्मण चाहे जो करे लेकिन बाकी समाज को शास्त्र की वही व्याख्या मंजूर होनी चाहिए जो ये पंडित कहें !!इति वार्ता:
नमो नारायण !!
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