Monday, September 11, 2017

माँ का नम्बर .

बस अभी यादें मिटाने निकली थी ! थोड़े कागज जलाने निकली थी ! सोचा था बिना देखे सब जला दूंगी ! अच्छा हो या बुरा अतीत सारा मिटा दूंगी ! ज्यादा पुराना हो तो अतीत भी रद्दी हो जाता है !
बस यही सोचकर उस ढेर में तीली लगाने निकली थी ! मगर कुछ याद ऐसी होती हैं ! आप न चाहें तो भी आँख भिगोती हैं !
ढेर ऊँचा था आँख नीची थी ! धुएं के नाम पर कुछ ऐसे आँख मीचीं थी !
बड़े से ढेर में छोटा सा एक पुर्जा था ! वो कागज के वेश में हमारी जीवन ऊर्जा था ! लगा कि वो ही सारा #अम्बर था ! उसमें माँ का पुराना नम्बर था !
माँ अनपढ़ थी सो कभी फोन नहीं करती थी ! लेकिन बच्चों के फोन न कट जाएँ इस आस में बार बार कान से लगाकर देखा करती थी !
जमाना जानता है ! अब यहाँ नहीं है #माँ !
मैं पता नहीं किस आस में नम्बर मिलाने निकली थी !
हर बार कम्प्यूटर की आवाज यही कहती ! #माँ अब इस नम्बर पर नहीं रहती !
जरा सी बात यूँ बढ़ जाएगी मालूम न था !
#ज्ञान की गंगा में जमुना उमड़ आएगी ,मालूम न था !
बस इसी भूल को दिल से मिटाने निकली थी !
थोड़े कागज जलाने निकली थी !
थोड़े कागज जलाने निकली थी !
दिल से !!!!!!!!माँ !!!!!!!!

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