मंगल ग्रह और वृक्षों का अपनी बहिन सीताजी के प्रति स्नेह
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🙏🏻मंगल ग्रह और वृक्षों का अपनी बहिन सीताजी के प्रति स्नेह
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🌇जयसीताराम
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भगवान् श्रीराम की अर्धांगिनी श्रीसीताजी संपूर्ण जगत् की जननी हैं, किंतु कुछ ऐसे भी सौभाग्यशाली प्राणी हैं, जिन्हें अखिल ब्रह्मांड का सृजन, पालन और संहार करने वाली श्रीसीताजी के भाई होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।
यद्यपि वाल्मीकीय रामायण, श्रीरामचरितमानस आदि प्रसिद्ध ग्रंथों में सीताजी के किसी भी भाई का कोई उल्लेख प्राप्त नहीं होता, किंतु महर्षि वाल्मीकिजी के अवतार गोस्वामी तुलसीदास जी, महर्षि वेदव्यासजी एवं अन्य संतों के ग्रंथों में सीताजी के भाई का परिचय प्राप्त होता है।
भगवान् श्रीराम की प्राणवल्लभा श्रीसीताजी के ये भाई हैं:-
(क.) पृथ्वी-पुत्री सीताजी के भाई:- (१.) मंगल ग्रह (२.) वृक्ष
(ख.) जनकदुलारी सीताजी के भाई- (३.) राजा जनक के पुत्र लक्ष्मीनिधि।
वैदिक भारत के राष्ट्रगान के रूप में प्रसिद्ध अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त (१२.१.१२) में ऋषि पृथ्वी की वंदना करते हुए कहते हैं— ‘माता भूमि पुत्रोऽहं पृथिव्याः’ अर्थात् हे पृथ्वी! आप मेरी माँ हैं और मैं आपका पुत्र हूँ। हम सब ऋषि-मुनियों के वंशज स्वयं को पृथ्वी माँ का पुत्र मानते हैं। सीताजी भी पृथ्वी की पुत्री हैं और इस संबंध से पृथ्वी माँ के पुत्र उनके भाई लगते हैं। आज हम आपको पृथ्वी-पुत्री सीताजी के दो भाइयों के संबंध में बताएँगे।
१. पृथ्वी-पुत्री सीताजी के भाई— मंगल ग्रह
भगवान् श्रीनारायण की अर्धांगिनी श्रीलक्ष्मीजी और चंद्रमा दोनों की उत्पत्ति समुद्र से होने के कारण हम लक्ष्मीजी को माँ कहते हैं और उनके भाई चंद्रमा को मामा। किंतु, यदि आप सीताजी को माँ कहते हैं, तो आज से मंगल (मार्स) को भी मामा-मामा कहना आरंभ कर दीजिए क्योंकि पृथ्वी का पुत्र मंगल ग्रह, पृथ्वी की पुत्री सीताजी का भाई है।
सीताजी और मंगल के बीच बहिन-भाई के स्नेह की एक दुर्लभ झाँकी का संकेत महर्षि वाल्मीकिजी के अवतार गोस्वामी तुलसीदासजी ने अपने ग्रंथ ‘जानकी मंगल’ में किया है, जिसका दर्शन करने के लिए आइए हम सब मिलकर मिथिला जनकपुर चलें!
जनकपुर के विवाह मंडप में दूल्हे सरकार श्रीराघवेंद्र और दुल्हन सियाजू बैठे हुए हैं। स्त्रियाँ श्रीसीतारामजी से श्रीगणेशजी और गौरीजी का पूजन करा रही हैं। राजा जनकजी ने अग्नि स्थापन करके हाथ में कुश और जल लेकर कन्या दान का संकल्प कर श्रीरामजी को अपनी सुकुमारी सिया समर्पित कर दी है। अब श्रीराम सीताजी की माँग में सिंदूर भर रहे हैं। और अब आ पहुँचा है सुंदर क्षण लाजा होम विधि का, जब दुल्हन का भाई खड़ा होकर अपनी बहिन की अंजलि में लाजा (भुना हुआ धान, जिसे लावा या खील भी कहते हैं) भरता है, दुल्हन के दोनों हाथों से दूल्हा भी अपने हाथ लगाता है और दुल्हन उस लाजा से अग्नि में होम करती है।
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जब पृथ्वी माँ को अपनी बिटिया सीता के विवाह का समाचार ज्ञात हुआ था, उसी समय वह दौड़ी गई थी अपने पुत्र मंगल के पास। अपनी बहिन सीताजी के विवाह का समाचार सुनकर मंगल भी फूला नहीं समाया था। वह भी अपनी बहिन के विवाह में छिपकर वेष बदलकर आया था। जैसे ही लाजा होम विधि का सुंदर क्षण उपस्थित हुआ और पौरोहित्य कर्म संपन्न कर रहे ऋषिवर ने आवाज लगाई— “दुल्हन के भाई उपस्थित हों!” मंगल तुरंत उठकर खड़े हो गए। श्याम वर्ण श्रीराम, मध्य में गौरवर्ण सियाजू और उनके पास रक्तवर्ण मंगल- तीनों अग्निकुंड के समीप खड़े हैं। मंगल अपनी बहिन सिया के हाथों में लाजा भर रहे हैं। सीताजी के करकमलों से ही श्रीराम के भी कर कमल लगे हैं।
ऋषिवर के मुख से उच्चारित ॐ अर्यमणं देवं, ॐ इयं नायुर्पब्रूते लाजा, ॐ इमाँल्लाजानावपाम्यग्नौ— इन तीन मंत्रों (पारस्कर गृह्यसूत्र १.६.२) के उद्घोष के मध्य सीताजी अपने भाई मंगल द्वारा तीन बार प्रदत्त लाजा का पति श्रीराम संग अग्नि में होम कर रही हैं—
सिय भ्राता के समय भोम तहँ आयउ।
दुरीदुरा करि नेगु सुनात जनायउ॥
(जानकी मंगल १४८)
जिस समय जानकीजी के भाई की आवश्यकता हुई, उस समय वहाँ पृथ्वी का पुत्र मंगलग्रह स्वयं आया और अपने को छिपाकर सब रीति-रस्म करके अपना सुंदर संबंध जनाया।
गीताप्रेस के प्रसिद्ध आध्यात्मिक लेखक श्रीसुदर्शनसिंहजी 'चक्र' ने अपने रामकथात्मक उपन्यास 'प्रभु आवत' में मंगल के अपनी बहिन सीता जी के प्रति स्नेह का सुंदर वर्णन किया है।
भगवान् श्रीराम के वनवास की १४ वर्ष की अवधि आज समाप्त हो रही है। श्रीसीतारामजी और लक्ष्मणजी की प्रतीक्षा चल रही है, मात्र अवध में ही नहीं, अपितु जनकपुरी, कौसलपूरी, सौमित्र देश, कैकेय देश, शृंगवेरपुर सहित पृथ्वी के अनेकानेक राज्यों में और साथ-साथ ही इस ब्रह्मांड के अन्य लोकों में भी। पृथ्वी-पुत्र मंगल, अत्रि-पुत्र चंद्र, चंद्र-पुत्र बुध, सूर्य-पुत्र शनि, और राहू-केतु ग्रहों की गोष्ठी में मंगल अपनी बहिन सीता और बहनोई श्रीराम के अयोध्या लौटने की प्रसन्नता अभिव्यक्त कर रहे हैं। उत्साहातिरेक से उनकी रक्तिम देह और अभी अधिक अरुण हो उठी है। वे कहते हैं कि उनकी अनुजा (छोटी बहिन) सीता के अपहरण का दुःसाहस करने वाला नीच दुष्ट रावण उन सीता के भाई मंगल से आशा करता था कि वे उस रावण के अनुकूल रहें। मंगल आज यह जानकर आनंदित हैं कि वह व्यभिचारी राक्षस अपने ही पापों की अग्नि में जलकर भस्म हो गया। मंगल भावविह्वल स्वर में कहते हैं— “निखिलेश्वरी ने मुझे गौरव दिया। धरानन्दिनी होकर वे अनुजा हुईं मेरी। …कोई सेवा नहीं कर सका मैं। श्रीकौसलेश का परा-क्रम वर्धन, उन अचिन्त्य शक्ति का कोई अभिवर्धन- क्या करेगा? मंगल उन (की कुंडली) के पराक्रम स्थान में रहेगा, यह गौरव मंगल का।”
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सीताराम नाम जप से मंगल होते हैं प्रसन्न—
भगवान् शिव के ललाट से पृथ्वी पर गिरे तीन स्वेदबिंदुओं से अवंतिका (उज्जैन) में शिप्रा के तट पर मंगलनाथ स्थान पर उत्पन्न मंगल।
रक्तवर्ण, चतुर्भुजाधारी मंगल करुणामयी पृथ्वी माँ का दुग्धपान कर पालित-पोषित हुए और भूमिपुत्र, भौम कहलाए।
जब परम वैष्णव भगवान् शिव के तेज से उत्पन्न हनुमान श्रीसीतारामजी के अनन्य भक्त हों, तो उन भोलेनाथ के पसीने से उत्पन्न मंगल भला कैसे पीछे रहें?
मंगल के दिन अवतरित होने के कारण, 'मंगलभवन अमंगलहारी' श्रीराम के सेवक होने के कारण और स्वयं 'मंगलमूरति मारुतनंदन' होने के कारण हनुमानजी मंगल के दिन ही विशेष रूप से पूजित होते हैं।
इन मंगल की तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने इन्हें शुक्रलोक से भी ऊपर मंगललोक (मार्स) प्रदान किया है, किंतु बहिन सीता के विवाह पर ये जनकपुर दौड़े हुए आते हैं।
ऐसे मंगल अपने प्रिय बहिन-बहनोई श्रीसीतारामजी से प्रेम करने वाले, उनके मधुर नाम और मंत्र का जप करने वाले उपासकों, भक्तों से भला स्वप्न में भी कैसे असंतुष्ट हो सकते हैं?
अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त के अनुसार वृक्ष भी मनुष्यों की ही भाँति पृथ्वी माँ के पुत्र हैं। मनुष्यों की भाँति वृक्ष भी संवेदनशील होते हैं और सुख-दुःख का अनुभव करते हैं, यह बात भारतीय वैज्ञानिक जगदीशचंद्र बोस सिद्ध कर चुके हैं।
पौराणिक गाथाओं के अनुसार प्रम्लोचा अप्सरा और कंडु ऋषि की नवजात कन्या को अनाथ पड़ा देखकर वृक्ष दुःखी हो उठे और उन वृक्षों ने उस कन्या का लालन-पालन किया था, जिससे वह कन्या ‘वार्क्षी’ कहलाई। वृक्षों के राजा चंद्रमा ने उसका विवाह प्रचेताओं से किया था। ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ में शकुन्तला की विदाई पर उसके द्वारा पले-बढ़े वृक्षों के रुदन का करुण प्रसंग है। भगवान् शंकर की भाँति स्वयं विषैली वायु का पान कर अमृतपूर्ण वायु जग को वितरित करने वाले, अपने फल-पुष्प, पत्ते, छाँह, रस, काष्ठ आदि से जगत् का उपकार करने वाले पृथ्वी के गर्भ से समुद्भूत वृक्षों को पृथ्वी-पुत्री सीता अपने भाई के समान मानती थीं।
रक्षाबंधन पर वृक्षों को राखी बाँधती थीं सीताजी—
रामानंद संप्रदाय के प्रसिद्ध संत जगद्गुरु रामभद्राचार्यजी द्वारा रचित ग्रंथ श्रीसीतारामकेलिकौमुदी के अनुसार बालिका सीताजी ने जनकपुर के प्रत्येक वृक्ष को राखी बाँधकर अपना भाई बना लिया था— ‘सीय बिदेह पुरी प्रति पादप, राखी के ताग से जोरि के बाँधी।’ (श्रीसीतारामकेलिकौमुदी २.९९) सीताजी बार बार वृक्षों के लिए गौरी गणेश की आराधना करती हैं, शंकरजी से प्रार्थना करती हैं और उनसे अपने वृक्ष भाइयों के लिए अगाध आशीर्वाद प्राप्त करती हैं—
बारहिं बार निहोरि महेशहिं, नेह ते गौरिहुँ को अवराधैं।
‘गिरिधर’ स्वामिनि बृक्षन के हित, आशिरबाद लहैं अवगाधैं॥
(श्रीसीतारामकेलिकौमुदी २.९३)
पर्यावरण रक्षा के लिए सीताजी की जागरूकता—
पर्यावरण रक्षा के लिए सतत जागरूक जगद्गुरु रामभद्राचार्यजी की बाल सीता वृक्षों को सगा भाई मानकर उनकी लकड़ी कभी नहीं कटातीं। वे अग्निहोत्र की समिधा के लिए भी हरी डालें काटने की आज्ञा नहीं देतीं। वे कोल-किरातों को भी कभी वन काटने नहीं देतीं—
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🍃 भाई सगे सिय मान तरून को, लाकरिहूँ कबहूँ न कटावैं।
पावक होत्र में सो समिधा हित, डारि हरी तरु की न छटावैं॥
कानन काटै न देइ किरातनि, शाखन आगिहुँ ते न हटावैं।
‘गिरिधर’ स्वामिनि पादप की, बहिनी बनि बीर बिपत्ति बटावैं॥
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(श्रीसीतारामकेलिकौमुदी २.९४)
इसके साथ-साथ सीताजी सभी से कहती हैं कि संसार के सार भगवान् श्रीराम के साले होने के कारण ये वृक्ष तुम्हारे मामा हैं, अतः इन्हें भूलकर भी न काटो—
सीय कहें जग सार के सार ये, भोर्यौं बिरीछ कबौं न कटावौ।
(श्रीसीतारामकेलिकौमुदी २.९५)
और तो और सीताजी अशोक वृक्ष की डाल में राखी बाँधकर उसके सिर पर जौ का पौधा रखती हैं और उसे टीका लगाकर समझाती हैं कि प्रभु श्रीराम की अगली रणलीला में जब मेरे प्रतिबिंब में माया की सीता वेदवती का आवेश होगा तो रावण उनका हरण कर लंका में तुम्हारे नीचे निवास देगा, तब तुम उसकी रक्षा करना—
आगिलि लीला में रक्षन हेतु ज्यौं, राखी अशोक की डारी में बाँधैं।
शीश धरैं जरई सिय सादर, टीका लगाइके भाइहिं साधैं॥
(श्रीसीतारामकेलिकौमुदी २.९३)
रामचरितमानस में वृक्षों का अपनी बहिन सीता के प्रति गूढ़ स्नेह—
गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस में भी हमें कदम-कदम पर वृक्षों का अपनी बहिन सीता के प्रति गूढ़ स्नेह का परिचय प्राप्त होता है, चाहे श्रीसीतारामजी राज्य में रहें या वन में। आइए कुछ झलकियाँ देखें!
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वनवास के समय सीताजी का अपने वृक्ष भाइयों पर विश्वास—
जब भगवान् श्रीराम अपने पिता दशरथजी ने प्रण की रक्षा हेतु १४ वर्ष के लिए वन जाने लगे, तो उस समय सीताजी उनके संग वन चलने का अनुरोध करती हुई कहती हैं कि मैं आपके चरणों को धोकर अपने भाई वृक्षों की छाँह में बैठकर (पायँ पखारि बैठि तरु छाहीं) आपको अपने आँचल से हवा किया करूँगी, समतल भूमि पर घास और वृक्ष के पत्तों को बिछाकर (सम महि तृन तरुपल्लव डासी) मैं पूरी रात आपके चरण दबाया करुँगी, मेरे भाई वृक्ष उत्तरीय तथा साड़ी के रूप में मुझे अपनी छाल (बलकल बिमल दुकूल) प्रदान करेंगे, उनके पत्तों से बनी कुटिया (परनसाल सुख मूल) में आपके संग मुझे देवभवन के समान सुख प्राप्त होगा, उनके पुष्प और पत्तों की शय्या (कुश किसलय साथरी सुहाई) मुझे सुख प्रदान करेगी, उनके कंद-मूल, फल मेरे लिए अमृत समान भोजन होंगे (कंद मूल फल अमिय अहारू)।
जब श्रीसीतारामजी अयोध्या छोड़कर जाने लगे, तो वहाँ के बगीचों में लगे वृक्ष और लताएँ अपनी बहिन-बहनोई सीतारामजी के विरह में सूख गईं (बागन बिटप बेलि कुम्हिलाहीं)।
वनवास काल में सीतारामजी और लक्ष्मणजी की वृक्षों द्वारा सेवा—
श्रीराम का बालसखा होने के कारण निषादराज गुह अपने मित्र श्रीराम की प्रिया सियाजू और उनके भाई वृक्षों के पारस्परिक स्नेह के संबंध में परीचित है। कदाचित् इसीलिए वह श्रीसीतारामजी के लिए फल और कंदमूल लेकर आता है (लिए फल मूल भेंट भरि भारा), उन्हें शिंशुपा (अशोक) वृक्ष के नीचे ठहराता है (तरु शिंशुपा मनोहर जाना), उनके लिए कुश और पत्तों की शय्या बनाता है (गुह सँवारि साथरी डसाई। कुश किसलयमय मृदुल सुहाई)। अपने बहनोई श्रीराम को वनवासी रूप प्रदान करने के लिए भी वृक्ष ने ही उनकी सहायता की। वटवृक्ष के दूध से ही भगवान् श्रीराम ने अपने शीश पर जटा का मुकुट धारण किया। (होत प्रात बट छीर मँगावा। जटा मुकुट निज शीष बनावा॥)
सीताजी के भाई इन वृक्षों के नीचे जब भगवान् श्रीराम विश्राम करने के लिए बैठते हैं, तो इन वृक्षों की प्रशंसा स्वर्ग के कल्पवृक्ष भी करते हैं (जेहि तरुतर प्रभु बैठहिं जाई। करहिं कलपतरु तासु बड़ाई॥) सीताजी द्वारा पूर्व में रामजी से कहे वचन (कंद मूल फल अमिय अहारू) को ध्यान में रखकर ही महर्षि भरद्वाज सुंदर कंदमूल, फल और अंकुर, शाक श्रीसीतारामजी और लक्ष्मणजी को समर्पित करते हैं (कंद मूल फल अंकुर नीके। दिए आनि मुनि मनहुँ अमी के॥)
वाल्मीकि मुनि के आश्रम में भी वृक्ष श्रीसीतारामजी का मन मोहते हैं— पहले अपने प्राकृतिक सौंदर्य से (सरनि सरोज बिटप बन फूले) और फिर वाल्मीकिजी द्वारा प्रदत्त अपने मधुर कंद, मूल, फलों से (कंद मूल फल मधुर मँगाए। सिय सौमित्रि राम फल खाए॥)
चित्रकूट में वृक्षों का श्रीसीताराम-प्रेम—
चित्रकूट में देवता कोल-किरातों के वेष में आकर भगवान् श्रीसीतारामजी के लिए पत्तों तथा घास की कुटिया बनाते हैं (रचे परन तृन सदन सुहाए), कदाचित् उन्हें भी ज्ञात है कि सीताजी को अपने भाई वृक्षों के पत्तों से बनी कुटिया (परनसाल सुख मूल) अच्छी लगती है, वहाँ के कोल-किरात वृक्षों के पत्तों के दोनों में कंद, मूल, फल भर-भरकर लाते हैं (कंद मूल फल भरि भरि दोना) और सचमुच सीताजी को अपने प्रियतम श्रीराम के साथ पत्तों से बनी कुटी अत्यंत प्रिय लगती है (परनकुटी प्रिय प्रियतम संगा), कंद-मूल और फल का भोजन उन्हें अमृत के समान लगता है (अशन अमिय सम कंद मूल फर), श्रीराम के साथ कुश और पत्तों की शय्या उन्हें सुख प्रदान करती है (नाथ साथ साथरी सुहाई)।
अपने बहिन-बहनोई श्रीसीतारामजी को चित्रकूट में निवास करते देखकर वृक्ष भी आनंदित होकर सुंदर लताओं के वितानों से आलिंगित होकर सदैव पुष्प और फल धारण करने लगे
(फूलहिं फलहिं बिटप बिधि नाना।
मंजु बलित बर बेलि बिताना॥)
स्वभाव से सुंदर और कल्पवृक्ष के समान इन वृक्षों को देखकर ऐसा प्रतीत होता था, मानो वे स्वर्गलोक के नंदन वन को छोड़कर चित्रकूट में चले आए हों
(सुरतरु सरिस सुभाय सुहाए।
मनहुँ बिबुध बन परिहरि आए॥),
देवता भी चित्रकूट वन के पक्षी, पशु, लताएँ, वृक्ष, तृणों को पुण्यों के पुंजस्वरूप कहकर दिन-रात उनकी प्रशंसा करते हैं (चित्रकूट के बिहग मृग, बेलि बिटप तृन जाति। पुन्य पुंज सब धन्य अस, कहहिं देव दिन राति॥)
चित्रकूट के वृक्ष अपने बहिन-बहनोई श्रीसीतारामजी को वापिस अयोध्या ले जाने के लिए आए हुए भरतजी को देखकर अत्यंत प्रसन्न हो उठते हैं और उनके साथ-साथ लताएँ और तृण (घास) भी फूलों से लद जाते हैं (बेलि बिटप तृन सफल सफूला), इससे प्रतीत होता है कि वृक्ष भी नहीं चाहते कि उनकी बहिन-बहनोई सीतारामजी वनवास के दुःख सहें।
निषादराज गुह भरतजी को पाकड़, जामुन, आम, तमाल और वट वृक्ष दिखाता है और बताता है कि मंदाकिनी नदी के समीप इन्हीं सघन वृक्षों के पास श्रीराम की पर्णकुटी विराजमान है (नाथ देखियहिं बिटप बिशाला। पाकरि जंबु रसाल तमाला॥ तिन तरुबरन मध्य बट सोहा। मंजु बिशाल देखि मन मोहा॥), वह भरतजी को श्रीराम और लक्ष्मणजी द्वारा लगाए गए तुलसीजी के अनेक श्रेष्ठ सुहावने वृक्ष भी दिखाता है (तुलसी तरुवर बिबिध सुहाए। कहुँ सिय पिय कहुँ लखन लगाए॥) और सीताजी द्वारा अपने हाथों से वटवृक्ष की छाँह में बनाई गई यज्ञवेदी भी (बट छाया बेदिका बनाई। सिय निज पानि सरोज सुहाई॥), गुह द्वारा बताए गए उन पाँचों वृक्षों को देखकर भरतजी के नैनों में जल उमड़ आया (सखा बचन सुनि बिटप निहारी। उमगे भरत बिलोचन बारी॥) और उनके हृदय में अनुराग रोकने से भी नहीं रुक सका (राम बास थल बिटप बिलोके। उर अनुराग रहत नहिं रोके॥)
जब सीताजी के पिता महाराज जनक चित्रकूट पहुँचते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है कि मानो आज पृथ्वी ने स्वयं अपने वास्तविक पति जनकजी का आतिथ्य करने को शृंगार किया हो (जाइ न बरनि मनोहरताई। जनु महि करति जनक पहुनाई॥), पृथ्वी के पुत्र और सीताजी के भाई वृक्ष और लताएँ सभी सुंदर फल-फूलों से युक्त हो गए (बेलि बिटप सब सफल सफूला), जनकपुर से आए सभी लोग उन वृक्षों को देख-देखकर प्रेम से अनुरक्त हो उठे (देखि देखि तरुवर अनुरागे), भगवान् श्रीराम के गुरुदेव वसिष्ठजी ने सभी मिथिलावासियों के लिए अनेक प्रकार के खाने योग्य पत्ते, फल और अमृत के समान स्वाद वाले मूल, कंद भेजे (दल फल मूल कंद बिधि नाना। पावन सुंदर सुधा समाना॥) और सबने उनको ग्रहण किया।
जब भरतजी अत्रि ऋषि के संग चित्रकूट भ्रमण करने जाते हैं, तो वृक्ष फूल-फल समर्पित कर तथा तृण कोमल होकर श्रीभरतजी की सेवा करते हैं (बिटप फूलि फलि तृन मृदुलाहीं)।
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