Tuesday, June 27, 2017

मंगल ग्रह और वृक्षों का अपनी बहिन सीताजी के प्रति स्नेह
*🕉😌🙏🏻मंगल ग्रह और वृक्षों का अपनी बहिन सीताजी के प्रति स्नेह🙏🏻😌🕉*
*🌸🌇जयसीताराम 🌇🌸*
भगवान् श्रीराम की अर्धांगिनी श्रीसीताजी संपूर्ण जगत् की जननी हैं, किंतु कुछ ऐसे भी सौभाग्यशाली प्राणी हैं, जिन्हें अखिल ब्रह्मांड का सृजन, पालन और संहार करने वाली श्रीसीताजी के भाई होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।
यद्यपि वाल्मीकीय रामायण, श्रीरामचरितमानस आदि प्रसिद्ध ग्रंथों में सीताजी के किसी भी भाई का कोई उल्लेख प्राप्त नहीं होता, किंतु महर्षि वाल्मीकिजी के अवतार गोस्वामी तुलसीदास जी, महर्षि वेदव्यासजी एवं अन्य संतों के ग्रंथों में सीताजी के भाई का परिचय प्राप्त होता है।
भगवान् श्रीराम की प्राणवल्लभा श्रीसीताजी के ये भाई हैं:-
(क.) पृथ्वी-पुत्री सीताजी के भाई:- (१.) मंगल ग्रह (२.) वृक्ष
(ख.) जनकदुलारी सीताजी के भाई- (३.) राजा जनक के पुत्र लक्ष्मीनिधि।
वैदि‍क भारत के राष्‍ट्रगान के रूप में प्रसिद्ध अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त (१२.१.१२) में ऋषि पृथ्वी की वंदना करते हुए कहते हैं— ‘माता भूमि पुत्रोऽहं पृथिव्याः’ अर्थात् हे पृथ्वी! आप मेरी माँ हैं और मैं आपका पुत्र हूँ। हम सब ऋषि-मुनियों के वंशज स्वयं को पृथ्वी माँ का पुत्र मानते हैं। सीताजी भी पृथ्वी की पुत्री हैं और इस संबंध से पृथ्वी माँ के पुत्र उनके भाई लगते हैं। आज हम आपको पृथ्वी-पुत्री सीताजी के दो भाइयों के संबंध में बताएँगे।
१. पृथ्वी-पुत्री सीताजी के भाई— मंगल ग्रह
भगवान् श्रीनारायण की अर्धांगिनी श्रीलक्ष्मीजी और चंद्रमा दोनों की उत्पत्ति समुद्र से होने के कारण हम लक्ष्मीजी को माँ कहते हैं और उनके भाई चंद्रमा को मामा। किंतु, यदि आप सीताजी को माँ कहते हैं, तो आज से मंगल (मार्स) को भी मामा-मामा कहना आरंभ कर दीजिए क्योंकि पृथ्वी का पुत्र मंगल ग्रह, पृथ्वी की पुत्री सीताजी का भाई है।
सीताजी और मंगल के बीच बहिन-भाई के स्नेह की एक दुर्लभ झाँकी का संकेत महर्षि वाल्मीकिजी के अवतार गोस्वामी तुलसीदासजी ने अपने ग्रंथ ‘जानकी मंगल’ में किया है, जिसका दर्शन करने के लिए आइए हम सब मिलकर मिथिला जनकपुर चलें!
जनकपुर के विवाह मंडप में दूल्हे सरकार श्रीराघवेंद्र और दुल्हन सियाजू बैठे हुए हैं। स्त्रियाँ श्रीसीतारामजी से श्रीगणेशजी और गौरीजी का पूजन करा रही हैं। राजा जनकजी ने अग्नि स्थापन करके हाथ में कुश और जल लेकर कन्या दान का संकल्प कर श्रीरामजी को अपनी सुकुमारी सिया समर्पित कर दी है। अब श्रीराम सीताजी की माँग में सिंदूर भर रहे हैं। और अब आ पहुँचा है सुंदर क्षण लाजा होम विधि का, जब दुल्हन का भाई खड़ा होकर अपनी बहिन की अंजलि में लाजा (भुना हुआ धान, जिसे लावा या खील भी कहते हैं) भरता है, दुल्हन के दोनों हाथों से दूल्हा भी अपने हाथ लगाता है और दुल्हन उस लाजा से अग्नि में होम करती है।
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जब पृथ्वी माँ को अपनी बिटिया सीता के विवाह का समाचार ज्ञात हुआ था, उसी समय वह दौड़ी गई थी अपने पुत्र मंगल के पास। अपनी बहिन सीताजी के विवाह का समाचार सुनकर मंगल भी फूला नहीं समाया था। वह भी अपनी बहिन के विवाह में छिपकर वेष बदलकर आया था। जैसे ही लाजा होम विधि का सुंदर क्षण उपस्थित हुआ और पौरोहित्य कर्म संपन्न कर रहे ऋषिवर ने आवाज लगाई— “दुल्हन के भाई उपस्थित हों!” मंगल तुरंत उठकर खड़े हो गए। श्याम वर्ण श्रीराम, मध्य में गौरवर्ण सियाजू और उनके पास रक्तवर्ण मंगल- तीनों अग्निकुंड के समीप खड़े हैं। मंगल अपनी बहिन सिया के हाथों में लाजा भर रहे हैं। सीताजी के करकमलों से ही श्रीराम के भी कर कमल लगे हैं।
ऋषिवर के मुख से उच्चारित ॐ अर्यमणं देवं, ॐ इयं नायुर्पब्रूते लाजा, ॐ इमाँल्लाजानावपाम्यग्नौ— इन तीन मंत्रों (पारस्कर गृह्यसूत्र १.६.२) के उद्घोष के मध्य सीताजी अपने भाई मंगल द्वारा तीन बार प्रदत्त लाजा का पति श्रीराम संग अग्नि में होम कर रही हैं—
सिय भ्राता के समय भोम तहँ आयउ।
दुरीदुरा करि नेगु सुनात जनायउ॥
(जानकी मंगल १४८)
जिस समय जानकीजी के भाई की आवश्यकता हुई, उस समय वहाँ पृथ्वी का पुत्र मंगलग्रह स्वयं आया और अपने को छिपाकर सब रीति-रस्म करके अपना सुंदर संबंध जनाया।
गीताप्रेस के प्रसिद्ध आध्यात्मिक लेखक श्रीसुदर्शनसिंहजी 'चक्र' ने अपने रामकथात्मक उपन्यास 'प्रभु आवत' में मंगल के अपनी बहिन सीता जी के प्रति स्नेह का सुंदर वर्णन किया है।
भगवान् श्रीराम के वनवास की १४ वर्ष की अवधि आज समाप्त हो रही है। श्रीसीतारामजी और लक्ष्मणजी की प्रतीक्षा चल रही है, मात्र अवध में ही नहीं, अपितु जनकपुरी, कौसलपूरी, सौमित्र देश, कैकेय देश, शृंगवेरपुर सहित पृथ्वी के अनेकानेक राज्यों में और साथ-साथ ही इस ब्रह्मांड के अन्य लोकों में भी। पृथ्वी-पुत्र मंगल, अत्रि-पुत्र चंद्र, चंद्र-पुत्र बुध, सूर्य-पुत्र शनि, और राहू-केतु ग्रहों की गोष्ठी में मंगल अपनी बहिन सीता और बहनोई श्रीराम के अयोध्या लौटने की प्रसन्नता अभिव्यक्त कर रहे हैं। उत्साहातिरेक से उनकी रक्तिम देह और अभी अधिक अरुण हो उठी है। वे कहते हैं कि उनकी अनुजा (छोटी बहिन) सीता के अपहरण का दुःसाहस करने वाला नीच दुष्ट रावण उन सीता के भाई मंगल से आशा करता था कि वे उस रावण के अनुकूल रहें। मंगल आज यह जानकर आनंदित हैं कि वह व्यभिचारी राक्षस अपने ही पापों की अग्नि में जलकर भस्म हो गया। मंगल भावविह्वल स्वर में कहते हैं— “निखिलेश्वरी ने मुझे गौरव दिया। धरानन्दिनी होकर वे अनुजा हुईं मेरी। …कोई सेवा नहीं कर सका मैं। श्रीकौसलेश का परा-क्रम वर्धन, उन अचिन्त्य शक्ति का कोई अभिवर्धन- क्या करेगा? मंगल उन (की कुंडली) के पराक्रम स्थान में रहेगा, यह गौरव मंगल का।”
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सीताराम नाम जप से मंगल होते हैं प्रसन्न—
भगवान् शिव के ललाट से पृथ्वी पर गिरे तीन स्वेदबिंदुओं से अवंतिका (उज्जैन) में शिप्रा के तट पर मंगलनाथ स्थान पर उत्पन्न मंगल।
रक्तवर्ण, चतुर्भुजाधारी मंगल करुणामयी पृथ्वी माँ का दुग्धपान कर पालित-पोषित हुए और भूमिपुत्र, भौम कहलाए।
जब परम वैष्णव भगवान् शिव के तेज से उत्पन्न हनुमान श्रीसीतारामजी के अनन्य भक्त हों, तो उन भोलेनाथ के पसीने से उत्पन्न मंगल भला कैसे पीछे रहें?
मंगल के दिन अवतरित होने के कारण, 'मंगलभवन अमंगलहारी' श्रीराम के सेवक होने के कारण और स्वयं 'मंगलमूरति मारुतनंदन' होने के कारण हनुमानजी मंगल के दिन ही विशेष रूप से पूजित होते हैं।
इन मंगल की तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने इन्हें शुक्रलोक से भी ऊपर मंगललोक (मार्स) प्रदान किया है, किंतु बहिन सीता के विवाह पर ये जनकपुर दौड़े हुए आते हैं।
ऐसे मंगल अपने प्रिय बहिन-बहनोई श्रीसीतारामजी से प्रेम करने वाले, उनके मधुर नाम और मंत्र का जप करने वाले उपासकों, भक्तों से भला स्वप्न में भी कैसे असंतुष्ट हो सकते हैं?
🌕🌍🌕 २. पृथ्वी-पुत्री सीताजी के भाई— वृक्ष
अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त के अनुसार वृक्ष भी मनुष्यों की ही भाँति पृथ्वी माँ के पुत्र हैं। मनुष्यों की भाँति वृक्ष भी संवेदनशील होते हैं और सुख-दुःख का अनुभव करते हैं, यह बात भारतीय वैज्ञानिक जगदीशचंद्र बोस सिद्ध कर चुके हैं।
पौराणिक गाथाओं के अनुसार प्रम्लोचा अप्सरा और कंडु ऋषि की नवजात कन्या को अनाथ पड़ा देखकर वृक्ष दुःखी हो उठे और उन वृक्षों ने उस कन्या का लालन-पालन किया था, जिससे वह कन्या ‘वार्क्षी’ कहलाई। वृक्षों के राजा चंद्रमा ने उसका विवाह प्रचेताओं से किया था। ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ में शकुन्तला की विदाई पर उसके द्वारा पले-बढ़े वृक्षों के रुदन का करुण प्रसंग है। भगवान् शंकर की भाँति स्वयं विषैली वायु का पान कर अमृतपूर्ण वायु जग को वितरित करने वाले, अपने फल-पुष्प, पत्ते, छाँह, रस, काष्ठ आदि से जगत् का उपकार करने वाले पृथ्वी के गर्भ से समुद्भूत वृक्षों को पृथ्वी-पुत्री सीता अपने भाई के समान मानती थीं।
रक्षाबंधन पर वृक्षों को राखी बाँधती थीं सीताजी—
रामानंद संप्रदाय के प्रसिद्ध संत जगद्गुरु रामभद्राचार्यजी द्वारा रचित ग्रंथ श्रीसीतारामकेलिकौमुदी के अनुसार बालिका सीताजी ने जनकपुर के प्रत्येक वृक्ष को राखी बाँधकर अपना भाई बना लिया था— ‘सीय बिदेह पुरी प्रति पादप, राखी के ताग से जोरि के बाँधी।’ (श्रीसीतारामकेलिकौमुदी २.९९) सीताजी बार बार वृक्षों के लिए गौरी गणेश की आराधना करती हैं, शंकरजी से प्रार्थना करती हैं और उनसे अपने वृक्ष भाइयों के लिए अगाध आशीर्वाद प्राप्त करती हैं—
बारहिं बार निहोरि महेशहिं, नेह ते गौरिहुँ को अवराधैं।
‘गिरिधर’ स्वामिनि बृक्षन के हित, आशिरबाद लहैं अवगाधैं॥
(श्रीसीतारामकेलिकौमुदी २.९३)
पर्यावरण रक्षा के लिए सीताजी की जागरूकता—
पर्यावरण रक्षा के लिए सतत जागरूक जगद्गुरु रामभद्राचार्यजी की बाल सीता वृक्षों को सगा भाई मानकर उनकी लकड़ी कभी नहीं कटातीं। वे अग्निहोत्र की समिधा के लिए भी हरी डालें काटने की आज्ञा नहीं देतीं। वे कोल-किरातों को भी कभी वन काटने नहीं देतीं—
*🍃 भाई सगे सिय मान तरून को, लाकरिहूँ कबहूँ न कटावैं।
पावक होत्र में सो समिधा हित, डारि हरी तरु की न छटावैं॥
कानन काटै न देइ किरातनि, शाखन आगिहुँ ते न हटावैं।
‘गिरिधर’ स्वामिनि पादप की, बहिनी बनि बीर बिपत्ति बटावैं॥🍂*_
(श्रीसीतारामकेलिकौमुदी २.९४)
इसके साथ-साथ सीताजी सभी से कहती हैं कि संसार के सार भगवान् श्रीराम के साले होने के कारण ये वृक्ष तुम्हारे मामा हैं, अतः इन्हें भूलकर भी न काटो—
सीय कहें जग सार के सार ये, भोर्यौं बिरीछ कबौं न कटावौ।
(श्रीसीतारामकेलिकौमुदी २.९५)
और तो और सीताजी अशोक वृक्ष की डाल में राखी बाँधकर उसके सिर पर जौ का पौधा रखती हैं और उसे टीका लगाकर समझाती हैं कि प्रभु श्रीराम की अगली रणलीला में जब मेरे प्रतिबिंब में माया की सीता वेदवती का आवेश होगा तो रावण उनका हरण कर लंका में तुम्हारे नीचे निवास देगा, तब तुम उसकी रक्षा करना—
आगिलि लीला में रक्षन हेतु ज्यौं, राखी अशोक की डारी में बाँधैं।
शीश धरैं जरई सिय सादर, टीका लगाइके भाइहिं साधैं॥
(श्रीसीतारामकेलिकौमुदी २.९३)
रामचरितमानस में वृक्षों का अपनी बहिन सीता के प्रति गूढ़ स्नेह—
गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस में भी हमें कदम-कदम पर वृक्षों का अपनी बहिन सीता के प्रति गूढ़ स्नेह का परिचय प्राप्त होता है, चाहे श्रीसीतारामजी राज्य में रहें या वन में। आइए कुछ झलकियाँ देखें!
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वनवास के समय सीताजी का अपने वृक्ष भाइयों पर विश्वास—
जब भगवान् श्रीराम अपने पिता दशरथजी ने प्रण की रक्षा हेतु १४ वर्ष के लिए वन जाने लगे, तो उस समय सीताजी उनके संग वन चलने का अनुरोध करती हुई कहती हैं कि मैं आपके चरणों को धोकर अपने भाई वृक्षों की छाँह में बैठकर (पायँ पखारि बैठि तरु छाहीं) आपको अपने आँचल से हवा किया करूँगी, समतल भूमि पर घास और वृक्ष के पत्तों को बिछाकर (सम महि तृन तरुपल्लव डासी) मैं पूरी रात आपके चरण दबाया करुँगी, मेरे भाई वृक्ष उत्तरीय तथा साड़ी के रूप में मुझे अपनी छाल (बलकल बिमल दुकूल) प्रदान करेंगे, उनके पत्तों से बनी कुटिया (परनसाल सुख मूल) में आपके संग मुझे देवभवन के समान सुख प्राप्त होगा, उनके पुष्प और पत्तों की शय्या (कुश किसलय साथरी सुहाई) मुझे सुख प्रदान करेगी, उनके कंद-मूल, फल मेरे लिए अमृत समान भोजन होंगे (कंद मूल फल अमिय अहारू)।
जब श्रीसीतारामजी अयोध्या छोड़कर जाने लगे, तो वहाँ के बगीचों में लगे वृक्ष और लताएँ अपनी बहिन-बहनोई सीतारामजी के विरह में सूख गईं (बागन बिटप बेलि कुम्हिलाहीं)।
वनवास काल में सीतारामजी और लक्ष्मणजी की वृक्षों द्वारा सेवा—
श्रीराम का बालसखा होने के कारण निषादराज गुह अपने मित्र श्रीराम की प्रिया सियाजू और उनके भाई वृक्षों के पारस्परिक स्नेह के संबंध में परीचित है। कदाचित् इसीलिए वह श्रीसीतारामजी के लिए फल और कंदमूल लेकर आता है (लिए फल मूल भेंट भरि भारा), उन्हें शिंशुपा (अशोक) वृक्ष के नीचे ठहराता है (तरु शिंशुपा मनोहर जाना), उनके लिए कुश और पत्तों की शय्या बनाता है (गुह सँवारि साथरी डसाई। कुश किसलयमय मृदुल सुहाई)। अपने बहनोई श्रीराम को वनवासी रूप प्रदान करने के लिए भी वृक्ष ने ही उनकी सहायता की। वटवृक्ष के दूध से ही भगवान् श्रीराम ने अपने शीश पर जटा का मुकुट धारण किया। (होत प्रात बट छीर मँगावा। जटा मुकुट निज शीष बनावा॥)
सीताजी के भाई इन वृक्षों के नीचे जब भगवान् श्रीराम विश्राम करने के लिए बैठते हैं, तो इन वृक्षों की प्रशंसा स्वर्ग के कल्पवृक्ष भी करते हैं (जेहि तरुतर प्रभु बैठहिं जाई। करहिं कलपतरु तासु बड़ाई॥) सीताजी द्वारा पूर्व में रामजी से कहे वचन (कंद मूल फल अमिय अहारू) को ध्यान में रखकर ही महर्षि भरद्वाज सुंदर कंदमूल, फल और अंकुर, शाक श्रीसीतारामजी और लक्ष्मणजी को समर्पित करते हैं (कंद मूल फल अंकुर नीके। दिए आनि मुनि मनहुँ अमी के॥)
वाल्मीकि मुनि के आश्रम में भी वृक्ष श्रीसीतारामजी का मन मोहते हैं— पहले अपने प्राकृतिक सौंदर्य से (सरनि सरोज बिटप बन फूले) और फिर वाल्मीकिजी द्वारा प्रदत्त अपने मधुर कंद, मूल, फलों से (कंद मूल फल मधुर मँगाए। सिय सौमित्रि राम फल खाए॥)
चित्रकूट में वृक्षों का श्रीसीताराम-प्रेम—
चित्रकूट में देवता कोल-किरातों के वेष में आकर भगवान् श्रीसीतारामजी के लिए पत्तों तथा घास की कुटिया बनाते हैं (रचे परन तृन सदन सुहाए), कदाचित् उन्हें भी ज्ञात है कि सीताजी को अपने भाई वृक्षों के पत्तों से बनी कुटिया (परनसाल सुख मूल) अच्छी लगती है, वहाँ के कोल-किरात वृक्षों के पत्तों के दोनों में कंद, मूल, फल भर-भरकर लाते हैं (कंद मूल फल भरि भरि दोना) और सचमुच सीताजी को अपने प्रियतम श्रीराम के साथ पत्तों से बनी कुटी अत्यंत प्रिय लगती है (परनकुटी प्रिय प्रियतम संगा), कंद-मूल और फल का भोजन उन्हें अमृत के समान लगता है (अशन अमिय सम कंद मूल फर), श्रीराम के साथ कुश और पत्तों की शय्या उन्हें सुख प्रदान करती है (नाथ साथ साथरी सुहाई)।
अपने बहिन-बहनोई श्रीसीतारामजी को चित्रकूट में निवास करते देखकर वृक्ष भी आनंदित होकर सुंदर लताओं के वितानों से आलिंगित होकर सदैव पुष्प और फल धारण करने लगे
(फूलहिं फलहिं बिटप बिधि नाना।
मंजु बलित बर बेलि बिताना॥)
स्वभाव से सुंदर और कल्पवृक्ष के समान इन वृक्षों को देखकर ऐसा प्रतीत होता था, मानो वे स्वर्गलोक के नंदन वन को छोड़कर चित्रकूट में चले आए हों
(सुरतरु सरिस सुभाय सुहाए।
मनहुँ बिबुध बन परिहरि आए॥),
देवता भी चित्रकूट वन के पक्षी, पशु, लताएँ, वृक्ष, तृणों को पुण्यों के पुंजस्वरूप कहकर दिन-रात उनकी प्रशंसा करते हैं (चित्रकूट के बिहग मृग, बेलि बिटप तृन जाति। पुन्य पुंज सब धन्य अस, कहहिं देव दिन राति॥)
चित्रकूट के वृक्ष अपने बहिन-बहनोई श्रीसीतारामजी को वापिस अयोध्या ले जाने के लिए आए हुए भरतजी को देखकर अत्यंत प्रसन्न हो उठते हैं और उनके साथ-साथ लताएँ और तृण (घास) भी फूलों से लद जाते हैं (बेलि बिटप तृन सफल सफूला), इससे प्रतीत होता है कि वृक्ष भी नहीं चाहते कि उनकी बहिन-बहनोई सीतारामजी वनवास के दुःख सहें।
निषादराज गुह भरतजी को पाकड़, जामुन, आम, तमाल और वट वृक्ष दिखाता है और बताता है कि मंदाकिनी नदी के समीप इन्हीं सघन वृक्षों के पास श्रीराम की पर्णकुटी विराजमान है (नाथ देखियहिं बिटप बिशाला। पाकरि जंबु रसाल तमाला॥ तिन तरुबरन मध्य बट सोहा। मंजु बिशाल देखि मन मोहा॥), वह भरतजी को श्रीराम और लक्ष्मणजी द्वारा लगाए गए तुलसीजी के अनेक श्रेष्ठ सुहावने वृक्ष भी दिखाता है (तुलसी तरुवर बिबिध सुहाए। कहुँ सिय पिय कहुँ लखन लगाए॥) और सीताजी द्वारा अपने हाथों से वटवृक्ष की छाँह में बनाई गई यज्ञवेदी भी (बट छाया बेदिका बनाई। सिय निज पानि सरोज सुहाई॥), गुह द्वारा बताए गए उन पाँचों वृक्षों को देखकर भरतजी के नैनों में जल उमड़ आया (सखा बचन सुनि बिटप निहारी। उमगे भरत बिलोचन बारी॥) और उनके हृदय में अनुराग रोकने से भी नहीं रुक सका (राम बास थल बिटप बिलोके। उर अनुराग रहत नहिं रोके॥)
जब सीताजी के पिता महाराज जनक चित्रकूट पहुँचते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है कि मानो आज पृथ्वी ने स्वयं अपने वास्तविक पति जनकजी का आतिथ्य करने को शृंगार किया हो (जाइ न बरनि मनोहरताई। जनु महि करति जनक पहुनाई॥), पृथ्वी के पुत्र और सीताजी के भाई वृक्ष और लताएँ सभी सुंदर फल-फूलों से युक्त हो गए (बेलि बिटप सब सफल सफूला), जनकपुर से आए सभी लोग उन वृक्षों को देख-देखकर प्रेम से अनुरक्त हो उठे (देखि देखि तरुवर अनुरागे), भगवान् श्रीराम के गुरुदेव वसिष्ठजी ने सभी मिथिलावासियों के लिए अनेक प्रकार के खाने योग्य पत्ते, फल और अमृत के समान स्वाद वाले मूल, कंद भेजे (दल फल मूल कंद बिधि नाना। पावन सुंदर सुधा समाना॥) और सबने उनको ग्रहण किया।
जब भरतजी अत्रि ऋषि के संग चित्रकूट भ्रमण करने जाते हैं, तो वृक्ष फूल-फल समर्पित कर तथा तृण कोमल होकर श्रीभरतजी की सेवा करते हैं (बिटप फूलि फलि तृन मृदुलाहीं)।


Monday, June 26, 2017

उनकी कृपा तो उनकी कृपा है !

आज एक मित्र ने पूछा है आप ईश्वर से कैसे मिली ?
कुछ मार्ग हमें भी बताओ !
लाखों लोग प्रतिदिन वृन्दावन आते हैं पर उन्हें पता है कि कौन उनके लिये ही आया है !
ऐसे भागकर आलिंगन-बद्ध करते हैं मानो फ़िर कोई सुदामा आ गया हो ! 

हम उनसे कैसे मिले नहीं जानते !!

कैसे बताएं कि हम गलती से अथवा तो उसकी इच्छा से खींच लिए गये हैं अध्यात्म पथ पर !
हमारा कभी कोई इरादा न था धार्मिक हो जाने का !
हमने कभी नहीं कहा कि प्रभु हमें अपनी शरण में ले लो !
आरम्भ बता सकते हैं जब हमारी सास ने हमें श्री रामचरित मानस पढने को दी ! और हमने ये कहकर छोड़ दी कि सारे धर्मों का ठेका स्त्रियों ने ही ले रखा है !
हम बड़े वाले नास्तिक थे !
और हठी भी !
लेकिन वो परमात्मा हमसे भी बड़ा हठी था !
बरगद सा विशाल हमारा अहंकार और आसमान सी विशाल उसकी दया दृष्टि !
उसने योजना बद्ध तरीके से हमारे अहंकार को काटना .छांटना शुरू किया !
पहले ससुराल की भट्टी में डाला ! निकलना चाहते थे ! झटपटाते थे लेकिन मायके वालों से भी धीरे धीरे एक एक कर सम्बन्ध खत्म हो गये !
ससुराल वालों ने अपनाया नहीं और मायके वाले छोड़ चुके थे ! लेकिन हम इतने जिद्दी थे कि आकाश की ओर
हाथ उठा कर परमात्मा को चैलेंज कर रहे थे !
हमें सबने छोड़ दिया लेकिन हम भाग्यवादी नहीं हुए और दिन रात मेहनत करते हुए आगे बढ़ रहे थे !
पति बीमार थे आर्थिक स्थिति कमजोर थी लेकिन हमारा हौंसला कम होने का नाम ही नहीं लेता था !
हमने एक बार भी परमात्मा को नहीं पुकारा !लेकिन वो हमें छोड़ने को तैयार न था !
कई बार डूबे ! फिर उबरे !
पैसा कमाते और कहीं न कहीं घाटा हो जाता !
ऐसे ही जीवन गुजर रहा था ! कि एक दिन पता चला बेटे को कोई गंभीर रोग होने की कोशिश में था ! हम डाक्टर के यहाँ गये !
डाक्टर ने एम् .आर .आई .के बाद बताया ! इसके पापा वाली समस्या हो सकती है
तुरंत ट्रीटमेंट कराएँ ! उस दिन हमने फिर हाथ उठाकर ईश्वर को चुनौती दे डाली ! देखती हूँ तू कहाँ तक रास्ता रोकेगा ! उस वक्त वैभव लक्ष्मी के व्रतों का बड़ा ही चलन था ! हमने भी चार व्रत रखे थे ! उन्हें वहीं छोड़ दिए ! और कह दिया दोनों बाप बेटे ठीक होंगे तो व्रत पूरे कर देंगे !कई बार डूबे ! फिर उबरे ! पैसा कमाते और कहीं न कहीं घाटा हो जाता ! ऐसे ही जीवन गुजर रहा था ! कि एक दिन पता चला बेटे को कोई गंभीर रोग होने की कोशिश में था ! हम डाक्टर के यहाँ गये ! डाक्टर ने एम् .आर .आई .के बाद बताया ! इसके पापा वाली समस्या हो सकती है तुरंत ट्रीटमेंट कराएँ ! उस दिन हमने फिर हाथ उठाकर ईश्वर को चुनौती दे डाली ! देखती हूँ तू कहाँ तक रास्ता रोकेगा ! उस वक्त वैभव लक्ष्मी के व्रतों का बड़ा ही चलन था ! हमने भी चार व्रत रखे थे ! उन्हें वहीं छोड़ दिए ! और कह दिया दोनों बाप बेटे ठीक होंगे तो व्रत पूरे कर देंगे !
और वो तो जैसे इंतजार में ही खड़ा था !
दोनों ठीक हो गये सिर्फ छ महीने के कोर्स से !
फिर हमने व्रत किये !
महालक्ष्मी के जप किये
फिर हम बीमार पड़े ! हमारे सब जमा हुए रूपये इलाज में चले गये !
नौकरी छूट गयी !
कर्ज भी था !
लेकिन एक दिन ऐसा चमत्कार हुआ कि हम फिर उस करुणानिधि को अनदेखा न कर सके !
हमने डेरा सच्चा सौदा से नाम दान लिया था !
लेकिन कभी दर्शन को न गये थे !
तो एक दिन हमारे पूज्य गुरुवर ब्रह्मलीन शाह सतनाम जी
हमें दर्शन दे गये .सपने में ! हमने उन्हें कोई साधारण बुजुर्ग समझा !
लेकिन जब दो चार महीने बाद किसी के घर उनकी फोटो देखि तो पता चला कि वो तो सिरसा वाले गुरु जी हैं !
तब हमने जाना कि परमात्मा किस तरह अपने निज जनों के लिए कष्ट उठाते हुए पीछे -पीछे घूमता है !
ये यात्रा का आरंभ था !
जिसे न शुरू करने में हमारा कोई हाथ था न आगे बढने में कोई हाथ !
हम बाढ़ के साथ बहते हुए तिनके गंगोत्री से रामेश्वरम की यात्रा पर निकल गये !
बहे जा रहे हैंअब शब्द नहीं है उस कृपा को समझाने के लिए !
आगे जो है उसे कहना मुश्किल है
कह भी दिया तो आप तक न पहुंचेगा .
ये समझिये कि हम दोनों हठी थे .
वो हमे ऊपर आने को कहता था .हम उसे नीचे आकर बात करने को कहते थे ! बस कुछ वो चले कुछ हम और आज हम बहन भाई हैं !
उसने सुदामा को वैभव देकर द्वारिकाधीश का मित्र कहने का अवसर दिया है और द्रौपदी को वनवासी बनाकर अपनी सखी होने का गौरव दिया है !
इस सारी कहानी में एक ही बात श्रेष्ठ थी कि हम उस अस्तित्व को नकार नहीं रहे थे ! वो है ये दृढ विश्वास था !
विश्वास था तभी तो झगड़ा था ! हवा से कौन झगड़ता है !
हम दोनों  का रिश्ता हम दोनों पहचान रहे थे ! 
उनकी कृपा तो उनकी कृपा है उनकी कृपा की बात न पूछो !!
जय जय श्री राधे गोविन्द !
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

Wednesday, June 21, 2017

इतिहास से ये सब गायब कर दिया हरामी सेकुलर बुद्धूजीवी और हिन्दू विरोधी इतिहास कारों ने....कमीनो ने आक्रमणकारियों लुटेरों बलात्कारियो को महान बनाकर गोबर को गुड़ बता कर पेश किया है बलात्कार की नाजायज औलादों ने.....
"जो लोग इतिहास पढ़ते नही वो इतिहास बना नही सकते"
आपको यह तो ज्ञात होगा कि NDA (National Defence Academy) में जो बेस्ट कैडेट होता है, उसको एक गोल्ड मैडल दिया जाता हैं, लेकिन
क्या आपको यह ज्ञात हैं कि उस मैडल का नाम "लचित बोरफुकन" है ?
कौन हैं ये "लचित बोरफुकन" ?
मुग़ल कभी बंगाल के आगे पूर्वोत्तर भारत पर कब्ज़ा क्यों नहीं कर सके ?
कारण - असम के परमवीर योद्धा "लचित बोरफूकन।"
अहोम राज्य (आज का आसाम या असम) के राजा थे चक्रध्वज सिंघा और दिल्ली में मुग़ल शासक था औरंगज़ेब। औरंगज़ेब का पूरे भारत पे राज करने का सपना अधूरा ही था बिना पूर्वी भारत पर कब्ज़ा जमाये।
इसी महत्वकांक्षा के चलते औरंगज़ेब ने अहोम राज से लड़ने के लिए एक विशाल सेना भेजी। इस सेना का नेतृत्व कर रहा था राजपूत राजा राजाराम सिंह।
अहोम राज के सेनापति का नाम था "लचित बोरफूकन।" कुछ समय पहले ही लचित बोरफूकन ने गौहाटी को दिल्ली के मुग़ल शासन से आज़ाद करा लिया था।
इससे बौखलाया औरंगज़ेब जल्द से जल्द पूरे पूर्वी भारत पर कब्ज़ा कर लेना चाहता था।
राजाराम सिंह ने जब गौहाटी पर आक्रमण किया तो विशाल मुग़ल सेना का सामना किया अहोम के वीर सेनापति "लचित बोरफूकन" ने। मुग़ल सेना का ब्रम्हपुत्र नदी के किनारे रास्ता रोक दिया गया। इस लड़ाई में अहोम राज्य के 10000 सैनिक मारे गए और "लचित बोरफूकन" बुरी तरह जख्मी होने के कारण बीमार पड़ गये। अहोम सेना का बुरी तरह नुकसान हुआ। राजाराम सिंह ने अहोम के राजा को आत्मसमर्पण ने लिए कहा। जिसको राजा चक्रध्वज ने "आखरी जीवित अहोमी भी मुग़ल सेना से लडेगा" कहकर प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया।
लचित बोरफुकन जैसे जांबाज सेनापति के घायल और बीमार होने से अहोम सेना मायूस हो गयी थी। अगले दिन ही लचित बोरफुकन ने राजा को कहा कि जब मेरा देश, मेरा राज्य आक्रांताओं द्वारा कब्ज़ा किये जाने के खतरे से जूझ रहा है, जब हमारी संस्कृति, मान और सम्मान खतरे में हैं तो मैं बीमार होकर भी आराम कैसे कर सकता हूँ ? मैं युद्ध भूमि से बीमार और लाचार होकर घर कैसे जा सकता हूँ ? हे राजा युद्ध की आज्ञा दें....
इसके बाद ब्रम्हपुत्र नदी के किनारे सरायघाट पर वो ऐतिहासिक युद्ध लड़ा गया, जिसमे "लचित बोरफुकन" ने सीमित संसाधनों के होते हुए भी मुग़ल सेना को रौंद डाला। अनेकों मुग़ल कमांडर मारे गए और मुग़ल सेना भाग खड़ी हुई। जिसका पीछा करके "लचित बोफुकन" की सेना ने मुग़ल सेना को अहोम राज के सीमाओं से काफी दूर खदेड़ दिया। इस युद्ध के बाद कभी मुग़ल सेना की पूर्वोत्तर पर आक्रमण नहीं हुई।
ब्रम्हपुत्र नदी के किनारे सरायघाट पर मिली उस ऐतिहासिक विजय के करीब एक साल बाद ( उस युद्ध में अत्यधिक घायल होने और लगातार अस्वस्थ रहने के कारण ) "लचित बोफुकन" सदैव के लिए सो गये |

निज भाषा अहै सब उन्नति को मूल

इतिहास के प्रकांड पंडित डॉ. रघुबीर प्राय: फ्रांस जाया करते थे। वे सदा फ्रांस के राजवंश के एक परिवार के यहाँ ठहरा करते थे।
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उस परिवार में एक ग्यारह साल की सुंदर लड़की भी थी। वह भी डॉ. रघुबीर की खूब सेवा करती थी। अंकल-अंकल बोला करती थी।
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एक बार डॉ. रघुबीर को भारत से एक लिफाफा प्राप्त हुआ। बच्ची को उत्सुकता हुई। देखें तो भारत की भाषा की लिपि कैसी है। उसने कहा अंकल लिफाफा खोलकर पत्र दिखाएँ। डॉ. रघुबीर ने टालना चाहा। पर बच्ची जिद पर अड़ गई।
डॉ. रघुबीर को पत्र दिखाना पड़ा। पत्र देखते ही बच्ची का मुँह लटक गया अरे यह तो अँगरेजी में लिखा हुआ है।
आपके देश की कोई भाषा नहीं है?
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डॉ. रघुबीर से कुछ कहते नहीं बना। बच्ची उदास होकर चली गई। माँ को सारी बात बताई। दोपहर में हमेशा की तरह सबने साथ साथ खाना तो खाया, पर पहले दिनों की तरह उत्साह चहक महक नहीं थी।
गृहस्वामिनी बोली डॉ. रघुबीर, आगे से आप किसी और जगह रहा करें। जिसकी कोई अपनी भाषा नहीं होती, उसे हम फ्रेंच, बर्बर कहते हैं। ऐसे लोगों से कोई संबंध नहीं रखते।
गृहस्वामिनी ने उन्हें आगे बताया "मेरी माता लोरेन प्रदेश के ड्यूक की कन्या थी। प्रथम विश्व युद्ध के पूर्व वह फ्रेंच भाषी प्रदेश जर्मनी के अधीन था। जर्मन सम्राट ने वहाँ फ्रेंच के माध्यम से शिक्षण बंद करके जर्मन भाषा थोप दी थी।
फलत: प्रदेश का सारा कामकाज एकमात्र जर्मन भाषा में होता था, फ्रेंच के लिए वहाँ कोई स्थान न था।
स्वभावत: विद्यालय में भी शिक्षा का माध्यम जर्मन भाषा ही थी। मेरी माँ उस समय ग्यारह वर्ष की थी और सर्वश्रेष्ठ कान्वेंट विद्यालय में पढ़ती थी।
एक बार जर्मन साम्राज्ञी कैथराइन लोरेन का दौरा करती हुई उस विद्यालय का निरीक्षण करने आ पहुँची। मेरी माता अपूर्व सुंदरी होने के साथ साथ अत्यंत कुशाग्र बुद्धि भी थीं। सब ‍बच्चियाँ नए कपड़ों में सजधज कर आई थीं। उन्हें पंक्तिबद्ध खड़ा किया गया था।
बच्चियों के व्यायाम, खेल आदि प्रदर्शन के बाद साम्राज्ञी ने पूछा कि क्या कोई बच्ची जर्मन राष्ट्रगान सुना सकती है?
मेरी माँ को छोड़ वह किसी को याद न था। मेरी माँ ने उसे ऐसे शुद्ध जर्मन उच्चारण के साथ इतने सुंदर ढंग से सुना पाते।
साम्राज्ञी ने बच्ची से कुछ इनाम माँगने को कहा। बच्ची चुप रही। बार बार आग्रह करने पर वह बोली 'महारानी जी, क्या जो कुछ में माँगू वह आप देंगी?'
साम्राज्ञी ने उत्तेजित होकर कहा 'बच्ची! मैं साम्राज्ञी हूँ। मेरा वचन कभी झूठा नहीं होता। तुम जो चाहो माँगो। इस पर मेरी माता ने कहा 'महारानी जी, यदि आप सचमुच वचन पर दृढ़ हैं तो मेरी केवल एक ही प्रार्थना है कि अब आगे से इस प्रदेश में सारा काम एकमात्र फ्रेंच में हो, जर्मन में नहीं।'
इस सर्वथा अप्रत्याशित माँग को सुनकर साम्राज्ञी पहले तो आश्चर्यकित रह गई, किंतु फिर क्रोध से लाल हो उठीं। वे बोलीं 'लड़की' नेपोलियन की सेनाओं ने भी जर्मनी पर कभी ऐसा कठोर प्रहार नहीं किया था, जैसा आज तूने शक्तिशाली जर्मनी साम्राज्य पर किया है।
साम्राज्ञी होने के कारण मेरा वचन झूठा नहीं हो सकता, पर तुम जैसी छोटी सी लड़की ने इतनी बड़ी महारानी को आज पराजय दी है, वह मैं कभी नहीं भूल सकती।
जर्मनी ने जो अपने बाहुबल से जीता था, उसे तूने अपनी वाणी मात्र से लौटा लिया।
मैं भलीभाँति जानती हूँ कि अब आगे लारेन प्रदेश अधिक दिनों तक जर्मनों के अधीन न रह सकेगा।
यह कहकर महारानी अतीव उदास होकर वहाँ से चली गई। गृहस्वामिनी ने कहा 'डॉ. रघुबीर, इस घटना से आप समझ सकते हैं कि मैं किस माँ की बेटी हूँ।
हम फ्रेंच लोग संसार में सबसे अधिक गौरव अपनी भाषा को देते हैं। क्योंकि हमारे लिए राष्ट्र प्रेम और भाषा प्रेम में कोई अंतर नहीं...।'
हमें अपनी भाषा मिल गई। तो आगे चलकर हमें जर्मनों से स्वतंत्रता भी प्राप्त हो गई। आप समझ रहे हैं ना !
*निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल*
*बिन निज भाषा ज्ञान के,मिटे न हिय की शूल*

Monday, June 19, 2017

31 मार्च !!

हैल्लो !! मैडम कल 31 मार्च है ! याद है ना ! इयरली क्लोजिंग है ! सुबह समय से ऑफ़िस पहुंचें ! देख लीजिये और कितना बिजनैस सबमिट करा सकती हैं ! ऑफ़िस रात बारह बजे तक चलेगा !  टार्गेट से ज्यादा अचीव करने का प्रयास करें !
जी सर ! कहते हुए फोन रखा और जल्दी जल्दी घर के काम समेटते हुए अनुराधा मन ही मन सम्भावित इन्वेस्टर्स पर नजर दौड़ाने लगी ! जिनमें कुछ तो ऐसे थे जिनसे कई बार चर्चा हो चुकी थीऔर कुछ ऐसे भी थे  जिन्हें कभी चलते चलते यूँ ही परिचय दिया था और भविष्य के लिए डायरी में नम्बर नोट कर लिया था !
अनुराधा एक इंश्योरेंस कम्पनी में एडवायजर थी और उसका पूरा प्रयास रहता कि अपने कस्टमर्स को बेहतर से बेहतर प्लान दे लाईफ और टेक्स दोनों बचाने का !
31 मार्च उसकी लाईफ में हमेशा ही चुनौती देते हुए आता है! जाने कब तक ?
उसे आज भी याद है जब 31 मार्च ने उसे पहली बार चुनौती दी थी !
हाँ वो 31 मार्च ही था ! उसके जीवन का अठारहवां बसंत और कठिन परिस्थितयों से जूझते हुए बारहवीं की परीक्षा का अंतिम दिन !
वो चाहती थी जैसे जिद करके यहाँ तक पहुंची है आगे भी जाये और किसी तरह ग्रेजुएशन कर ले ! फिर बी.एड .और फिर अपने सपनों की जिन्दगी ! सपने भी कोई बहुत बड़े न थे बस संस्कृत से विशेष लगाव था सो संस्कृत की मैडम से भी विशेष लगाव था ! और वो भविष्य में स्वयं को उसी तस्वीर में देखना चाहती थी ! लेकिन ?
क्रमशः---------

Tuesday, June 6, 2017

तुलसी का समाज और "समाज "की तुलसी .


पीहर" क्यों आती हैं बेटियाँ ?*
“बेटियाँ कुछ लेने नहीं आती है पीहर"
..बेटियाँ..

..पीहर आती है..
..अपनी जड़ों को सींचने के लिए..
..तलाशने आती हैं भाई की खुशियाँ..
..वे ढूँढने आती हैं अपना सलोना बचपन..
..वे रखने आतीं हैं..
..आँगन में स्नेह का दीपक..
..बेटियाँ कुछ लेने नहीं आती हैं पीहर..
..बेटियाँ..
..ताबीज बांधने आती हैं दरवाजे पर..
..कि नज़र से बचा रहे घर..
..वे नहाने आती हैं ममता की निर्झरनी में..
..देने आती हैं अपने भीतर से थोड़ा-थोड़ा सबको..
..बेटियाँ कुछ लेने नहीं आती हैं पीहर..
..बेटियाँ..
..जब भी लौटती हैं ससुराल..
..बहुत सारा वहीं छोड़ जाती हैं..
..तैरती रह जाती हैं..
..घर भर की नम आँखों में..
..उनकी प्यारी मुस्कान..
..जब भी आती हैं वे, लुटाने ही आती हैं अपना वैभव..
..बेटियाँ कुछ लेने नहीं आती हैं पीहर......
बहुत "चंचल" बहुत
"खुशनुमा " सी होती है "बेटिया".
"नाज़ुक" सा "दिल" रखती है "मासूम" सी होती है "बेटिया".
"बात" बात पर रोती है
"नादान" सी होती है "बेटिया".
"रेहमत" से "भरपूर"
"खुदा" की "Nemat" है "बेटिया".
"घर" महक उठता है
जब "मुस्कराती" हैं "बेटिया".
"अजीब" सी "तकलीफ" होती है
जब "दूसरे" घर जाती है "बेटियां".
"घर" लगता है सूना सूना "कितना" रुला के "जाती" है "बेटियां"
"ख़ुशी" की "झलक"
"बाबुल" की "लाड़ली" होती है "बेटियां"
ये "हम" नहीं "कहते"
यह तो "रब " कहता है. . क़े जब मैं बहुत खुश होता हु तो "जनम" लेती है
"प्यारी सी बेटियां"
*Dedicated to all sisters, mothers & Daughters*....

Monday, June 5, 2017

गंगा दशहरा !!

यदि ज्येष्ठ शुक्ला दशमी के दिन मंगलवार रहता हो व हस्त नक्षत्र युता तिथि हो यह सब पापों के हरने वाली होती है। वराह पुराण में लिखा हुआ है कि, ज्येष्ठ शुक्ला दशमी बुधवारी में हस्त नक्षत्र में श्रेष्ठ नदी स्वर्ग से अवतीर्ण हुई थी वह दस पापों को नष्ट करती है। इस कारण उस तिथि को दशहरा कहते हैं। ज्येष्ठ मास, शुक्ल पक्ष, बुधवार, हस्त नक्षत्र, गर, आनंद, व्यतिपात, कन्या का चंद्र, वृषभ के सूर्य इन दस योगों में मनुष्य स्नान करके सब पापों से छूट जाता है।

महिमा

भविष्य पुराण में लिखा हुआ है कि, जो मनुष्य इस दशहरा के दिन गंगा के पानी में खड़ा होकर दस बार इस स्तोत्र को पढ़ता है चाहे वो दरिद्र हो, चाहे असमर्थ हो वह भी प्रयत्नपूर्वक गंगा की पूजा कर उस फल को पाता है। यह दशहरा के दिन स्नान करने की विधि पूरी हुई। स्कंद पुराण का कहा हुआ दशहरा नाम का गंगा स्तोत्र और उसके पढ़ने की विधि - सब अवयवों से सुंदर तीन नेत्रों वाली चतुर्भुजी जिसके कि, चारों भुज, रत्नकुंभ, श्वेतकमल, वरद और अभय से सुशोभित हैं, सफेद वस्त्र पहने हुई है।
मुक्ता मणियों से विभूषित है, सौम्य है, अयुत चंद्रमाओं की प्रभा के सम सुख वाली है जिस पर चामर डुलाए जा रहे हैं, वाल श्वेत छत्र से भलीभाँति शोभित है, अच्छी तरह प्रसन्न है, वर के देने वाली है, निरंतर करुणार्द्रचित्त है, भूपृष्ठ को अमृत से प्लावित कर रही है, दिव्य गंध लगाए हुए है, त्रिलोकी से पूजित है, सब देवों से अधिष्ठित है, दिव्य रत्नों से विभूषित है, दिव्य ही माल्य और अनुलेपन है, ऐसी गंगा के पानी में ध्यान करके भक्तिपूर्व मंत्र से अर्चना करें। 'ॐ नमो भगवति हिलि हिलि मिलि मिलि गंगे माँ पावय पावय स्वाहा' यह गंगाजी का मंत्र है।
इसका अर्थ है कि, हे भगवति गंगे! मुझे बार-बार मिल, पवित्र कर, पवित्र कर, इससे गंगाजी के लिए पंचोपचार और पुष्पांजलि समर्पण करें। इस प्रकार गंगा का ध्यान और पूजन करके गंगा के पानी में खड़े होकर ॐ अद्य इत्यादि से संकल्प करें कि, ऐसे-ऐसे समय ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में प्रतिपदा से लेकर दशमी तक रोज-रोज एक बढ़ाते हुए सब पापों को नष्ट करने के लिए गंगा स्तोत्र का जप करूँगा। पीछे स्तोत्र पढ़ना चाहिए। ईश्वर बोले कि, आनंदरूपिणी आनंद के देने वाली गंगा के लिए बारंबार नमस्कार है।
विष्णुरूपिणी के लिए और तुझ ब्रह्म मूर्ति के लिए बारंबार नमस्कार है।। 1।। तुझ रुद्ररूपिणी के लिए और शांकरी के लिए बारंबार नमस्कार है, भेषज मूर्ति सब देव स्वरूपिणी तेरे लिए नमस्कार है।। 2।।
सब व्याधियों की सब श्रेष्ठ वैद्या तेरे लिए नमस्कार, स्थावर जंगमों के विषयों को हरण करने वाली आपको नमस्कार।। 3।। 
संसाररूपी विष के नाश करने वाली एवं संतप्तों को जिलाने वाली तुझ गंगा के लिए नमस्कार ; तीनों तापों को मिटाने वाली प्राणेशी तुझ गंगा को नमस्कार।। 4।। मूर्ति तुझ गंगा के लिए नमस्कार, सबकी संशुद्धि करने वाली पापों को बैरी के समान नष्ट करने वाली तुझ...।। 5।। भुक्ति, मुक्ति, भद्र, भोग और उपभोगों को देने वाली भोगवती तुझ गंगा को।। 6।। तुझ मंदाकिनी के लिए देवे वाली के लिए बारंबार नमस्कार, तीनों लोकों की भूषण स्वरूपा तेरे लिए एवं तीन पंथों से जाने वाली के लिए बार-बार नमस्कार।

Sunday, June 4, 2017

दूर्वा !!

प्रायः जो वस्तु स्वास्थ्य के लिए हितकर सिद्ध होती थी, उसे हमारे पूर्वजों ने धर्म के साथ जोड़कर उसका महत्व और भी बढ़ा दिया। दूब भी ऐसी ही वस्तु है। यह सारे देश में बहुतायत के साथ हर मौसम में उपलब्ध रहती है। दूब का पौधा एक बार जहाँ जम जाता है, वहाँ से इसे नष्ट करना बड़ा मुश्किल होता है। इसकी जड़ें बहुत ही गहरी पनपती हैं। दूब की जड़ों में हवा तथा भूमि से नमी खींचने की क्षमता बहुत अधिक होती है, यही कारण है कि चाहे जितनी सर्दी पड़ती रहे या जेठ की तपती दुपहरी हो, इन सबका दूब पर असर नहीं होता और यह अक्षुण्ण बनी रहती है।
( तंत्र शास्त्र में उल्लेख )
पाँच दुर्वा के साथ भक्त अपने पंचभूत-पंचप्राण अस्तित्व को गुणातीत गणेश को अर्पित करते हैं। इस प्रकार तृण के माध्यम से मानव अपनी चेतना को परमतत्व में विलीन कर देता है। गणेश की पूजा में दो, तीन या पाँच दुर्वा अर्पण करने का विधान तंत्र शास्त्र में मिलता है। इसके गूढ़ अर्थ हैं। संख्याशास्त्र के अनुसार दुर्वा का अर्थ जीव होता है, जो सुख और दु:ख ये दो भोग भोगता है। जिस प्रकार जीव पाप-पुण्य के अनुरूप जन्म लेता है। उसी प्रकार दुर्वा अपने कई जड़ों से जन्म लेती है। दो दुर्वा के माध्यम से मनुष्य सुख-दु:ख के द्वंद्व को परमात्मा को समर्पित करता है। तीन दुर्वा का प्रयोग यज्ञ में होता है। ये 'आणव', 'कार्मण और 'मायिक'रूपी अवगुणों का भस्म करने का प्रतीक है।
( उद्यानों की शोभा )
दूब को संस्कृत में 'दूर्वा', 'अमृता', 'अनंता', 'गौरी', 'महौषधि', 'शतपर्वा', 'भार्गवी' इत्यादि नामों से जानते हैं। दूब घास पर उषा काल में जमी हुई ओस की बूँदें मोतियों-सी चमकती प्रतीत होती हैं। ब्रह्म मुहूर्त में हरी-हरी ओस से परिपूर्ण दूब पर भ्रमण करने का अपना निराला ही आनंद होता है। पशुओं के लिए ही नहीं अपितु मनुष्यों के लिए भी पूर्ण पौष्टिक आहार है दूब। महाराणा प्रताप ने वनों में भटकते हुए जिस घास की रोटियाँ खाई थीं, वह भी दूब से ही निर्मित थी।[3] राणा के एक प्रसंग को कविवर कन्हैया लाल सेठिया ने अपनी कविता में इस प्रकार निबद्ध किया है-
अरे घास री रोटी ही,
जद बन विला वड़ो ले भाग्यो।
नान्हों सो अमरयौ चीख पड्यो,
राणा रो सोयो दुख जाग्यो।
( औषधीय गुण )
दूब घास की शाखा
अर्वाचीन विश्लेषकों ने भी परीक्षणों के उपरांत यह सिद्ध किया है कि दूब में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं। दूब के पौधे की जड़ें, तना, पत्तियाँ इन सभी का चिकित्सा क्षेत्र में भी अपना विशिष्ट महत्व है। आयुर्वेद में दूब में उपस्थित अनेक औषधीय गुणों के कारण दूब को 'महौषधि' में कहा गया है। आयुर्वेदाचार्यों के अनुसार दूब का स्वाद कसैला-मीठा होता है। विभिन्न पैत्तिक एवं कफज विकारों के शमन में दूब का निरापद प्रयोग किया जाता है। दूब के कुछ औषधीय गुण निम्नलिखित हैं-
संथाल जाति के लोग दूब को पीसकर फटी हुई बिवाइयों पर इसका लेप करके लाभ प्राप्त करते हैं।
इस पर सुबह के समय नंगे पैर चलने से नेत्र ज्योति बढती है और अनेक विकार शांत हो जाते है।
दूब घास शीतल और पित्त को शांत करने वाली है।
दूब घास के रस को हरा रक्त कहा जाता है, इसे पीने से एनीमिया ठीक हो जाता है।
नकसीर में इसका रस नाक में डालने से लाभ होता है।
इस घास के काढ़े से कुल्ला करने से मुँह के छाले मिट जाते है।
दूब का रस पीने से पित्त जन्य वमन ठीक हो जाता है।
इस घास से प्राप्त रस दस्त में लाभकारी है।
यह रक्त स्त्राव, गर्भपात को रोकती है और गर्भाशय और गर्भ को शक्ति प्रदान करती है।
कुँए वाली दूब पीसकर मिश्री के साथ लेने से पथरी में लाभ होता है।
दूब को पीस कर दही में मिलाकर लेने से बवासीर में लाभ होता है।
इसके रस को तेल में पका कर लगाने से दाद, खुजली मिट जाती है।
दूब के रस में अतीस के चूर्ण को मिलाकर दिन में दो-तीन बार चटाने से मलेरिया में लाभ होता है।
इसके रस में बारीक पिसा नाग केशर और छोटी इलायची मिलाकर सूर्योदय के पहले छोटे बच्चों को नस्य दिलाने से वे तंदुरुस्त होते है। बैठा हुआ तालू ऊपर चढ़ जाता है।