Thursday, March 30, 2017

#बलिप्रथा_तटस्थ_समीक्षा
शाकाहारी हिंदुओं की एक बड़ी समस्या है खून देखकर उल्टी आने लगती है,सर चकराने लगता है और हाथ पाँव ढीले पड़ जाते हैं।
अब जरा इतिहास में एक कथित कुरीति को खंगालते हैं।
#बलिप्रथा...।
अब कई महापुरुष मुझसे असहमत होंगे, होते रहें।आपका अधिकार है।
बलिप्रथा में एक आध्यात्मिक पहलू एक तंत्र साधक ने कई बरस पहले बताया था कि उसके पहले पशु का एक गुप्त अनुष्ठान द्वारा संस्कार होता है।फिर उसे देवता को अर्पण किया जाता है।इसके परिणाम स्वरूप उस पशु को अगला जन्म मानव का प्राप्त होता है।यदि ये सत्य है तो बलिप्रथा एक आध्यात्मिक उपचार हुई, आत्मा का।
अब इसका सामाजिक या सामरिक महत्व भी समझते हैं।बलि में ब्राह्मण पूजन और तांत्रिक अनुष्ठान संपन्न करता था।उसका एक सहयोगी पशु को संस्कारित कर बलिस्थल पर लाता था।वही पशु का वध भी करता था।उसे #खट्टिक_ब्राह्मण कहते थे।आज उसे #खटीक बना कर अछूत मान लिया गया है।१००० वर्षों के अंधकार की कृपा से।
अस्तु, जब खट्टिक उपलब्ध नहीं होता तो मुख्य पुजारी की सहमति से क्षत्रिय या कोई अन्य ये कार्य करता था।
पुजारी मंत्रोच्चार करता और सही समय पर खट्टिक उसके एक इशारे पर एक घात में खड्गपात से पशु को अर्पण कर देता।रुधिर की धारा को पात्र में ले पुजारी को दिया जाता जिससे वह महाकाली को स्नान कराता।
जितने समय में रक्त स्नान और जल स्नान संपन्न होता खट्टिक माँस के खंड थाल में लाकर रख देता।पुजारी देवी को भोग अर्पण कर माँस प्रसाद रूप में राजा को भिजवा देता और राजा उसे पका कर स्वजनों के साथ ग्रहण कर लेता।अक्सर यजमान राजा ही होते थे।
पुजारी माँस नहीं खाते थे।मात्र क्रिया संपन्न कर हट जाते थे।
इसका एक गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव होता था।रक्त मांस से किसी को घबराहट नहीं होती थी।
फिर थोपी गई अहिंसा का समय आया।भैंसे और बकरे जैसे पशु जो संख्या बढ़ने पर उत्पाती हो जाते थे इससे उनकी संख्या काबू में रहती थी।किंतु जड़ अहिंसा सिद्धांत से हम ऐसे सम्मोहित हुए कि पूरा आर्यावर्त ऋषि मुनि हो गया।कुप्रथा बता कर बलि बंद करा दी।भारत के सामुहिक अवचेतन में रक्त माँस से घृणा व भय का संबंध जुड़ता चला गया।कुछ निम्न जातियों और क्षत्रिय समाज का पशु बलि से लेकिन फिर भी जुड़ाव रहा।फलतः जब मुस्लिम आक्रमण हुए तो शस्त्र उठाने का दायित्व उन्हीं पर आ गया। शाकाहारी वर्ग से बहुत कम लोग योद्धा हो पाए।और हम १००० साल विधर्मियों की क्रूरता के दंश भोगते रहे।
एक अन्य बहुत विवादित प्रथा थी '#नरबलि'।
वाममार्ग के बहुत दुर्लभ ग्रंथ "#महाकाल_संहिता" में उसका विशद वर्णन है।उसमें शत्रु देश के गुप्तचरों,हत्यारों, देशद्रोहियों व युद्धबंदियों की नरबलि का विधान है।
नक्सलियों से जिहादियों तक सब उस विधान के पात्र हैं।
इतना न हो तो हे हिंदू महात्माओं अपने बच्चों सहित महीने में एक दो बार कसाई मंडी और पोस्ट मार्टम रूम घूम आया करो।
अन्यथा....... हर बलात्कार के बाद मोमबत्ती जुलूस निकाल लेना, और हर हत्या को #संघी_गुंडे की हत्या मान लेना।

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