Tuesday, March 14, 2017

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम् । लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम् वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥
मानस की दिव्यता
आइये रामचरित मानस की स्वयम्भूत दिव्यता को समझें। अपने चमत्कारिक प्रभाव के कारण ही मानस आज विष्व की सर्वाधिक बिकने वाली धार्मिक पुस्तक है। अरबों की संख्या में इसकी प्रतियाँ बिक चुकी हैं। इसका सुन्दरकाण्ड तो इससे भी कई गुणा ज्यादा बिकता है। दिग्दिगन्त में इसकी कीर्ति छाई हुई है। किसी को गुणवान पुत्र चाहिये तो वो ‘‘एक बार भूपति मन माहीं, भै गलानि मोरें सुत नाहीं’’।1/188/1 का सम्पुट लगाकर इसका पाठ करता है। किसी को सुयोग्य जीवन साथी या सुन्दर पति चाहिये तो ‘‘देबि पूजि पद कमल तुम्हारे, सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे’’1/235/2 का सम्पुट प्रयोग करता है। किसी को निजी मकान चाहिये तो ‘‘सुंदर सदनु सुखद सब काला, तहाँ बासु लै दीन्ह भुआला’’1/126/7 का सम्पुट, किसी को उच्च विद्या चाहिये तो ‘‘गुरु गृहँ गए पढ़न रघुराई, अलप काल विद्या सब आई’’ 1/203/4 का सम्पुट, किसी का समय कठिनाइयों भरा है तो ‘‘दैहिक दैविक भौतिक तापा, राम राज नहिं काहुहि ब्यापा’’ 7/20/1 और यदि कोई असाध्य रोग से ग्रस्त है तो ‘‘दीन दयाल बिरिदु संभारी, हरहु नाथ मम संकट भारी’’5/26/4 को सम्पुट बना लेते हैं।
मानस जीवन में जिन विशम परिस्थितियों से रूबरू होना पड़ता है वे सब मानस में प्रसंगों के रूप में मौजूद हैं। उनसे कैसे निपटा गया यही पाठ से षिक्षा मिलती है और वहाँ के दोहे चैपाई ही सम्पुट के रूप में महामंत्र का कार्य करते हैं। मानस वक्ताओं ने सकाम भक्तों की कामना पूर्ति का आष्वासन दिया है
‘‘जे सकाम नर सुनहिं जे गावहिं, सुख संपति नाना बिधि पावहिं।7/14/3
श्रद्धा विष्वास रखने वालों की कामना पूर्ति होती है। इसका पता धन्यवाद ज्ञापन हेतु आयोजित अखण्ड रामायण के गूँजते सम्पुटों के स्वरों से लग जाता है। सभी मनोकामनाएँ पूरी हो गईं तो सुनाई पड़ता है
‘‘प्रभु की कृपा भयउ सबु काजू जन्म हमार सुफल भा आजू’’।5/29/4,
सन्तान प्राप्ति हुई तो
‘‘मंगल भवन अमंगल हारी, द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी’’।1/111/4,
मकान बन गया तो
‘‘प्रभुता तजि प्रभु कीन्ह सनेहू, भयउ पुनीत आजु यहु गेहू’’2/8/7
चमत्कृत करने वाली इस दिव्यता के पीछे एक कारण तो है मानस की पाणिनि व्याकरण के सिद्धान्त पर की गई रचना, दूजे में इसे भगवान उमा महेष्वर से मिला हुआ षुभाषीर्वाद-
सपनेहु साँचेहु मोहि पर जौं हर गौरि पसाउ।
तौ फुर होउ जो कहेउँ सब भाशा भनिति प्रभाउ।।1/15
तत्काल प्रभाव दिखाने वाले साबर मंत्र भी भगवान उमा महेष्वर के ही रचे हुये हैं ‘‘कलि बिलोकि जग हित हर गिरिजा, साबर मंत्र जाल जिन्ह सिरिजा। अनमिल आखर अरथ न जापू, प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू। और विष्व की अद्वितीय, अलौकिक पाणिनि व्याकरण का सूत्रजाल भी इन्हीं षूल पाणि का रचा हुआ है- ‘‘नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नव पंचवारम्।
अद्धर्तुकामः सनकादि सिद्धानेतद्विमर्षे षिवसूत्र जालम्।।

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