कितनी भीड़ जुटी है फिर भी शंकर आज अकेले हैं |
औघड़दानी की देहरी पर इच्छाओं के मेले हैं ||
श्रृद्धा ,सेवा और परिश्रम ,सबकी अपनी बोली है |
फक्कड बाबा शंकर को भरनी दुनिया की झोली है ||
जब मन्दिर की देहरी तक कोई अनुरागी आता है |
वैरागी शंकर अनुरागी होकर हाथ बढ़ाता है ||
आओ बैठो कहकर भोले बाबा हाथ बढ़ाते हैं |
और हम प्रेम भरे हाथों पर कुछ पैसा रख आते हैं ||
मेरी बारी ,मेरी बारी कहकर शोर मचाते हैं ..
तेरी गंगा के जल से तुझपे अहसान चढ़ाते हैं ||
भिखमंगों की दुनिया में मेरे सरकार अकेले हैं ||
औघड़दानी की देहरी पर ,इच्छाओं के मेले हैं |
अपनी झूठन डाल डाल कर तुझको झूठा करते हैं |
चादर ओढ़े साधू की ईश्वर को लूटा करते हैं ||
वो सतयुग था जब गंगा माँ ब्रह्मलोक से आई थी .
भाव भरे दिल में जग से मिलने की इच्छा लाई थी ||
अब दुनिया को गंगा की इच्छा से कोई प्यार नहीं .
कैसी थी और कैसी हो गयी दुनियां को दरकार नहीं
शंकर अपनी जटा बांध लो गंगा मैया रोती है .
झूठे लोगों की झूठन धो -धोकर मैली होती हैं
अब त्रिवेणी की छाती पर अवशेषों के मेले हैं |
कितनी भीड़ जुटी है फिर भी शंकर आज अकेले हैं
श्री हरि
औघड़दानी की देहरी पर इच्छाओं के मेले हैं ||
श्रृद्धा ,सेवा और परिश्रम ,सबकी अपनी बोली है |
फक्कड बाबा शंकर को भरनी दुनिया की झोली है ||
जब मन्दिर की देहरी तक कोई अनुरागी आता है |
वैरागी शंकर अनुरागी होकर हाथ बढ़ाता है ||
आओ बैठो कहकर भोले बाबा हाथ बढ़ाते हैं |
और हम प्रेम भरे हाथों पर कुछ पैसा रख आते हैं ||
मेरी बारी ,मेरी बारी कहकर शोर मचाते हैं ..
तेरी गंगा के जल से तुझपे अहसान चढ़ाते हैं ||
भिखमंगों की दुनिया में मेरे सरकार अकेले हैं ||
औघड़दानी की देहरी पर ,इच्छाओं के मेले हैं |
अपनी झूठन डाल डाल कर तुझको झूठा करते हैं |
चादर ओढ़े साधू की ईश्वर को लूटा करते हैं ||
वो सतयुग था जब गंगा माँ ब्रह्मलोक से आई थी .
भाव भरे दिल में जग से मिलने की इच्छा लाई थी ||
अब दुनिया को गंगा की इच्छा से कोई प्यार नहीं .
कैसी थी और कैसी हो गयी दुनियां को दरकार नहीं
शंकर अपनी जटा बांध लो गंगा मैया रोती है .
झूठे लोगों की झूठन धो -धोकर मैली होती हैं
अब त्रिवेणी की छाती पर अवशेषों के मेले हैं |
कितनी भीड़ जुटी है फिर भी शंकर आज अकेले हैं
श्री हरि
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