Saturday, April 30, 2016



||ॐ शांति ||
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आज की सुबह कुछ झुलसा रही है ,
सुना है बसंती हवा जा रही है ||
कभी भोर में जो नमी सी घुली थी ,
सुना है उसे चांदनी खा रही है ||
चमन की वीरानी डराने लगी है ,
क्यूँ खिलने से पहले कली जल रही है ||
अभी तो चमन में भरी बोर हर सू ,
तो कोयल क्यूँ नगमें सुनाती नहीं है ||
कभी तो उठेंगे घने मेघ वन में ,
मयूरी क्यों नर्तन से घबरा रही है ||
ये शब्दों के शोले किसे ढूंढते हैं ,
मेरी लेखनी आग बरसा रही है ||
समय एक सफर है मुसाफिर हैं हम सब ,
ये ऋतुएं तो राहों में टकरा रही हैं ||
आज की सुबह कुछ झुलसा रही है
सुना है बसंती हवा जा रही है
श्री हरि
जय जय श्री राधे

Wednesday, April 6, 2016

बड़ा गुरुर था हम चेहरा पढना जानते हैं ,
किसी के झूठ सच में फर्क करना जानते हैं 
फिर एक दिन हमें एक गौहरे नायाब मिला .
हमें यकीं था हम हीरे को भी पहचानते हैं .
हम अपने आपको जौहरी बताते फिरते थे 
किसी शहर में हीरों की तिजारत करते थे ,
फिर एक दिन हमें मलाल हुआ .
खुला जो राज फिर ऐसा बड़ा कमाल हुआ .
वो शहर जिसमें बड़े कोहिनूर मिलते थे
वो सारे कांच थे जो खान में निकलते थे
हमें तो अब तलक यकीं नहीं आता .
कि हमने कांच को भी कोहिनूर कह डाला .
हमारे हार में वो सबसे आगे दिखता है .
हमारी हार हुई सबसे कहता फिरता है .
हमारी कशमकश हर रोज बढती जाती है
उतारें हार या फिर हार को हरा डालें